एक महान क्रान्तिकारी का कहना था कि, गुलाम देश में जीवित रहने की अपेक्षा मृत्यु की गोद में सो जाना अच्छा है।” और यह कहना था शचीन्द्रनाथ बख्शी का ।
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| शचीन्द्रनाथ बख्शी |
बख्शी जी का जन्म 25 दिसम्बर 1904 को वाराणसी में हुआ था। उनके माता-पिता बंगाल के निवासी थे, किन्तु तीर्थस्थान के प्रेमी होने के कारण काशी में जाकर बस गये थे। काशी में ही बख्शी जी की शिक्षा-दीक्षा भी हुई थी। उन्होंने काशी के प्रिन्स कालेज से इन्टर की परीक्षा पास की थी।
बख्शी जी व्यायाम के बड़े प्रेमी थे। अपने विद्यार्थी जीवन में ही वे व्यायाम किया करते थे। जब वे बड़े हुए, तो उनकी व्यायाम-निष्ठा अधिक बढ़ गई। उस समय वे अपने साथियों को भी व्यायाम करने की शिक्षा दिया करते थे।
वे विद्यार्थी जीवन में ही सोचा करते थे, जिस प्रकार आनन्दमठ के संन्यासियों ने गोरों को देश से बाहर निकालने का प्रयत्न किया था, बड़े होने पर उसी प्रकार का प्रयत्न वे भी करेंगे
पढ़ाई छोड़कर कुछ क्रान्तिकारी कार्य करने की सोची। इस उद्देश्य से उन्होंने पहले सेण्ट्र्ल हेल्थ इम्प्रूविंग सोसाइटी बनायी फिर सेण्ट्रल हेल्थ यूनियन का गठन किया। हेल्थ यूनियन के बैनर तले उन्होंने बनारस के नवयुवकों को संगठित किया और तैराकी की कई प्रतियोगिताएँ आयोजित कीं। 1923 में दिल्ली की स्पेशल काँग्रेस के दौरान वे बिस्मिल के सम्पर्क में आये। उसके बाद वे उनकी क्रान्तिकारी पार्टी एच॰आर॰ए॰ हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन में शामिल हो गये। कुछ दिनों बाद झाँसी से निकलने वाले एक अखबार का सम्पादन किया।
ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध सशस्त्र क्रान्ति के लिये गठित हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के सक्रिय सदस्य भी रहे।
रिपब्लिकन एसोसियेशन सारे भारत में क्रांति की आग जला कर ब्रिटिश शासन को भगाना चाहती थी। इस कार्य के लिए उसे धन की आवश्यकता थी। धन के अभाव को दूर करने के लिए पहले तो गांवों में डाके डाले गये. फिर सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई गई।
इसके अलावा इन्होंने रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में काकोरी काण्ड में भाग लिया था और फरार हो गये। बख्शी ने काकोरी काण्ड में प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया था परन्तु पुलिस के हाथ नहीं आये। घर से फरार हो गये और बिहार में पार्टी का कार्य छुपे तौर पर करते रहे।
बख्शी को भागलपुर से पुलिस ने उस समय गिरफ्तार किया जब काकोरी-काण्ड के मुख्य मुकदमे का फैसला सुनाया जा चुका था।
स्पेशल जज जे॰आर॰डब्लू॰ बैनेट की अदालत में काकोरी षड्यन्त्र का पूरक मुकदमा दर्ज़ हुआ और 13 जुलाई 1927 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गयी। 1937 में जेल से छूटकर आये तो काँग्रेस पार्टी के लिये जी-जान से काम किया।
स्वतन्त्र भारत में काँग्रेस से उनका मोहभंग हुआ और वे जनसंघ में शामिल हो गये। उन्होंने उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव जीता और लखनऊ जाकर रहने लगे।
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में 80 वर्ष की आयु में 23 नवम्बर 1984 को उनका निधन हुआ।
शचीन्द्रनाथ बख्शी ने अपने क्रान्तिकारी संस्मरणों पर आधारित दो पुस्तकें भी लिखीं थीं जो उनके मरने के बाद ही प्रकाशित हो सकीं। दोनों पुस्तकों का विवरण इस प्रकार है:
क्रान्ति के पथ पर: एक क्रान्तिकारी के संस्मरण और
वतन पे मरने वालों का जिसे नई दिल्ली ग्लोबल हारमनी पब्लिशर्स ने 2009 में प्रकाशन किया।

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