नमस्कार दोस्तों मेरा नाम है प्रियंका शर्मा, जैसा कि हमारे Vlog का नाम है "theheroes" इस पर आपको मिलेंगी भारत के महान व्यक्तियों के बारे मे संपूर्ण जानकारी जिन्होंने अपने राष्ट्र और राष्ट्रीयता के लिए अपना पूरा जीवन खपाया। अपने आदर्श कार्यो से आने वाली पीढ़ी के लिए एक मशाल कायम की।
05 जुलाई 2023
गंगाधर राव नेवालकर का जीवन परिचय
गंगाधर राव का जन्म 1814 मे हुआ था इनके पिता का नाम शिव राव भाऊ नेवालकर और माता का नाम पद्मा बाई था।
गंगाधर राव नेवालकर उत्तर भारत में स्थित झाँसी के 5वें राजा थे, जो की झाँसी के पहले शासक रघुनाथ हरी नेवलकर के वंशज थे।
गंगाधर राव के पूर्वज महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले से आये थे पेशवाओ के शासन काल में इनमे से कुछ खानदेश चले गए और वहां पेशवा और होल्कर सेना में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करने लगे। रघुनाथ हरी नेवलकर ने बुदेलखंड में मराठा साम्राज्य स्थापित किया था,और जब वे बूढ़े होने लगे तब उन्होंने अपने छोटे भई शिव राव भाऊ को झांसी सौंप दी।
1838 में रघुनाथ राव तृतीय के देहांत के बाद 1843 में ब्रिटिश शासकों ने उनके छोटे भाई गंगाधर राव को झाँसी का राजा घोषित कर दिया।
गंगाधर राव का पहला विवाह रमाबाई से हुआ था, जिनकी जल्द ही मृत्यु हो गई। रमाबाई कभी भी झाँसी की महारानी नहीं बनीं क्योंकि रमाबाई की मृत्यु के बाद ही गंगाधर राव ने 1843 में राजा की उपाधि धारण की ।
दरअसल गंगाधर राव के राजा बन ने के पीछे एक कहानी है ।
रामचन्द्र राव के कोई बच्चा नहीं था इसलिए इन्होंने अपने भाई रघुनाथ राव के बेटे कृष्णा राव को गोद लिया उस समय शास्त्रों और पंडितों ने कृष्णा राव के गोद लेने को मान्यता नहीं दी इस कारण रामचन्द्र राव ने रघुनाथ राव को राजा बना दिया।
रघुनाथ राव एक अयोग्य शासक सिद्ध हुए उनके कारण झांसी की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर होने लगी।
इस कारण 1837 में ब्रिटिश शासको ने उनसे सत्ता उनसे छीनकर अपने हाथ में ले ली।
रघुनाथ राव के देहांत के बाद फिर से ये सवाल उठा की अब झांसी की सत्ता किसे सौपी जाए।
ऐसे में राजा बनने के लिए 4 लोगों के नाम थे रघुनाथ राव के छोटे भाई गंगाधर राव,राम चन्द्र राव के दत्तक पुत्र कृष्णा राव,रघुनाथ राव की महारानी और रघुनाथ राव की दासी गजरा का पुत्र अली बहादुर
इन चारो मे से राजा चुन ने के लिये एक कमिशन बनाया गया जिसमे गंगाधर राव को सबसे उपयुक्त उम्मीदावर मानकर उन्हें झांसी की सत्ता सौपी गयी, लेकिन अंग्रेजों ने कुछ अधिकार अपने पास रख लिए क्युकी रघुनाथ राव के शासन काल में झांसी पर कुछ कर्जा हो गया था इसलिए अंग्रेजों ने ये तय किया कि जब तक उन्हें पूरे पैसे नहीं मिल जाते, वे झांसी के शासन में अपना हस्तक्षेप रखेंगे
राजा गंगाधर राव एक योग्य शासक थे इसलिए सत्ता मिलने के बाद उन्होंने जब मणिकर्णिका से विवाह किया उसके कुछ सालों में ही अंग्रेजों का सारा कर्जा उतार दिया जब सारा कर्जा उतर गया तब झांसी का पूर्ण शासन लेने की बात आई, तो अंग्रेजों ने झांसी को पूरी तरह से लौटाने पर सहमती सिर्फ इस शर्त पर दी कि गंगाधर को अंग्रेजो की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए एक ब्रिटिश सैन्य टुकड़ी अपने राज्य में रखनी होगी,और इसका पूरा खर्चा भी उठाना होगा. गंगाधर को ना चाहते हुए भी यह शर्त स्वीकार करनी पड़ी।
गंगाधर राव ने झांसी को व्यवस्थित करने के लिए बहुत से कार्य किये,उन्होंने कुछ योग्य और अनुभवी मंत्रियों को प्रशासन के लिए नियुक्त किया.फिर उन्होंने अपनी सैन्य टुकड़ियों को व्यवस्थित किया और झाँसी की चारों तरफ से सुरक्षा को सुनिशिचित किया. इस तरह बहुत ही कम समय में झाँसी ने बहुत विकास किया. महाराज गंगाधर राव को हाथी और घोड़ो का बहुत शौक था. उनके पास बहुत से हाथी और घोड़े थे।
राज्य और प्रशासन की व्यवस्था सुनिश्चित होने के बाद महाराज गंगाधर राव ने तीर्थ यात्रा पर जाने की योजना बनाई , उन्होंने अपनी पत्नी के साथ तीर्थ यात्रा शुरू की. इस धार्मिक यात्रा में वो गया,प्रयाग होते हुए वाराणसी पहुंचे. वाराणसी रानी लक्ष्मीबाई का जन्म स्थान था,यहाँ पहुंचकर महाराज ने प्रार्थनाए की,दान किया और अन्य धार्मिक कार्य किये. फिर वो झांसी लौट आये और यहाँ उन्होंने सफल धार्मिक यात्रा के लिए बड़ा उत्सव किया।
1851 में रानी लक्ष्मी बाई ने एक पुत्र को जन्म दिया,महाराजा और महारानी की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था. लेकिन विधाता को कुछ और ही मंजूर था उनका यह पुत्र 4 महीनों के बाद दुनिया छोडकर चला गया।
अपने पुत्र के जाने के गम में गंगाधर बहुत उदास रहने लगे अक्टूबर 1853 में नवरात्र के दिनों में अपनी कुलदेवी की आराधना करते समय उनकी तबियत अचानक से बिगड़ी और दशहरे के दिन उन्हें तीव्र पेचिश की बीमारी का पता लगा।
हालांकि उन्हें लगता हैं की वो अब भी ठीक हो जायेंगे, लेकिन अपने धर्म और कर्तव्य को ध्यान में रखते हुए इन्होंने वासुदेव नेवलकर के पुत्र आनंद राव जो उस समय मात्र 5 साल के बालक थे को सभी धार्मिक अनुष्ठानों के साथ गोद लिया।
गोद लेने के बाद आनंद राव का नाम बदलकर दामोदर गंगाधर राव रखा गया गोद लेने के पारम्परिक अनुष्ठान में राज्य के सभी गणमान्य व्यक्ति और बुंदेलखंड के ब्रिटिश राजनायिक मेजर एलिस और लोकल ब्रिटिश आर्मी के अधिकारी कैप्टेन मार्टिन मौजुद थे।
जब महाराजा ने गोद लेने की सभी राजकीय प्रक्रियाएं पूरी कर ली तब उन्होंने ब्रिटिश सरकार को एक पत्र लिखवाया कि
मैंने जिस 5 साल के बालक को अपना दत्तक पुत्र घोषित किया हैं उसका नाम आनद राव हैं लेकिन वो अब से दामोदर गंगाधर राव के नाम से जाना जायेगा. यह बच्चा हमारे परिवार का ही सदस्य हैं,और रिश्तेदारी में मेरा पौत्र हैं. यदि मैं अभी इस बीमारी से नहीं बच पाऊं तो मुझे उम्मीद हैं की सरकार मेरे इस छोटे से बालक की सुरक्षा करेगी जब तक मेरी पत्नी जीवित हैं वह इस राज्य और मेरे पुत्र की संरक्षक होगी. वह इस पूरे राज्य की प्रशासक होगी इसलिए आप सुनिश्चित करें कि मेरे जाने के बाद मेरी पत्नी को झांसी मे शासन करते हुए किसी समस्या का सामना न करना पड़े।”
गंगाधर राव ने यह पत्र मेजर एलिस को दे दिया, उसके तुरंत बाद वो बेहोश हो गये मेजर एलिस और कैप्टेन मार्टिन ने उन्हें दवाई दी और लौट गए. महारनी लक्ष्मी बाई नेपथ्य में अपने पति के पास आकर बैठ गई और दवाई के कारण राजा को नींद आ गयी और रात में 4 बजे राजा ने आँख खोली तब प्रजा अपने प्रिय राजा के स्वास्थ की मंगल कामना के लिए महल के सामने एकत्र हो रखी थी. लेकिन प्रजा की शुभकामना और मेजर एलिस की भाग-दौड़ और अंग्रेज डॉक्टर को बुलाना कहीं काम नहीं आया क्योंकि राजा ने अंग्रेजी उपचार लेने से मना कर दिया और 20 नवम्बर 1853 की मध्य रात्री को महाराजा ने देह त्याग दी।
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