17 जून 2023

Dadabhai Naoroji | Indian nationalist leader

आज हम बतायेंगे ‘भारतीय राजनीति के पितामह’ के नाम से प्रसिद्ध भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तीन बार अध्यक्ष रहे, और 1906 में सार्वजनिक रूप से स्वराज की मांग उठाने वाले दादाभाई नौरोजी के बारे में।

 दादाभाई नौरोजी का जन्म 04 सितम्बर, 1825 को महाराष्ट्र में एक गरीब पारसी परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम नौरोजी पलंजी दोर्दी और माता का नाम मानेकबाई नौरोजी दोर्दी था ।


दादाभाई नौरोजी 

दादाभाई की शादी 11 साल की उम्र में, 7 साल की गुलबाई से हो गई थी, उस समय भारत में बाल विवाह का चलन था दादाभाई के 3 बच्चे थे, 1 बेटा एवं 2 बेटी।


दादाभाई की शुरुवाती शिक्षा ‘नेटिव एजुकेशन सोसायटी स्कूल’ से हुई थी. इसके बाद दादाभाई ने ‘एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट’ बॉम्बे से पढाई की, दादाभाई गणित एवं अंग्रेजी में बहुत अच्छे थे। 15 साल की उम्र में दादाभाई को क्लेयर्स के द्वारा स्कॉलरशिप मिली थी।

दादाभाई एक पारसी पुरोहित परिवार से थे, इन्होने 1 अगस्त 1851 को ‘रहनुमाई मज्दायास्नी सभा’ का गठन किया था। जिसका उद्देश्य था पारसी धर्म को एक साथ इकट्टा करना । यह सोसायटी आज भी मुंबई में चलाई जा रही है।

1853 में दादाभाई ने फोर्थनाईट पब्लिकेशन के तहत ‘रास्ट गोफ्तार’ बनाया था जो आम आदमी की पारसी अवधारणाओं को स्पष्ट करने में सहायक था।

1855 में 30 साल की उम्र में दादाभाई को एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट में गणित एवं फिलोसफी का प्रोफेसर बना दिया गया था | यह पहले भारतीय थे जिन्हें किसी कॉलेज में प्रोफेसर बनाया गया था।

1855 में दादाभाई ‘Cama and Corporation. कंपनी के हिस्सेदार बने | दादाभाई लंदन गए और अपनी हिस्सेदारी वाली कंपनी मे काम करने लगे लेकिन कंपनी के अनैतिक तरीके उन्हें पसंद नहीं आये और इस कंपनी से इस्तीफा दे दिया । लंदन से लौटने के बाद 1859 में दादाभाई ने खुद की cotton ट्रेडिंग फर्म बनायी , जिसका नाम रखा ‘नौरोजी and Corporation।

1860 के दशक की शुरूआत में दादाभाई ने सक्रिय रूप से भारतीयों के उत्थान के लिए काम करना शुरू किया |वे भारत में अंग्रेजों की प्रवासीय शासनविधि के खिलाफ थे |

इन्होनें अंग्रेजों के सामने ‘Drain Theory’ प्रस्तुत की जिसमें बताया गया कि अंग्रेज कैसे भारत का शोषण कर रहे है, कैसे वे योजनाबद्ध तरीके से भारत के धन और संसाधनों का दुरुपयोग कर रहे हैं और देश को गरीब बना रहे है |

साल 1880 में दादाभाई एक बार फिर लंदन गए। और 1892 में वहां हुए आमचुनाव के दौरान उन्हें सेंट्रल फिन्सबरी की तरफ से लिबरल पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुना गया। जहां वे पहले ब्रिटिश भारतीय सांसद चुने गए।

इस दौरान उन्होंने भारत और इंग्लैंड में एक साथ आईसीएस की प्रारंभिक परीक्षाओं के आयोजन के लिए ब्रिटिश संसद में प्रस्ताव पारित करवाया। उन्होंने भारत और इंग्लैंड के बीच प्रशासनिक और सैन्य खर्च के विवरण की सूचना देने के लिए विले कमीशन और रॉयल कमीशन भी पारित करवाया।

इन्होने 1885 – 1888 के बीच में मुंबई की विधान परिषद के सदस्य के रूप में भी कार्य किया था |

1886 में दादाभाई नौरोजी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया | इसके अलावा दादाभाई 1893 एवं 1906 में भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे | तीसरी बार 1906 में जब दादाभाई अध्यक्ष बने थे तब उन्होंने पार्टी में उदारवादियों और चरमपंथियों के बीच विभाजन को रोका था |

दादाभाई नौरोजी ने 30 जून 1917 को 91 वर्ष की आयु मे अंतिम सांस ली। उनके देश और देशवासियों के प्रति उनका योगदान भुलाया नहीं जा सकता। दादाभाई नौरोजी ने न केवल भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी बल्कि ब्रिटिश अधिकारियों के बीच विशेष रूप से ब्रिटिश संसद में संसद के एक आधिकारिक सदस्य के रूप में हस्तक्षेप की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुंबई में दादाभाई नौरोजी रोड, कराची पाकिस्तान में दादाभाई नौरोजी रोड, केंद्र सरकार के सेवकों की आवासीय कॉलोनी, नौरोजी नगर, दक्षिणी दिल्ली और लंदन के फिन्सबरी सेक्शन में नौरोजी स्ट्रीट सहित कई स्थलों और स्थानों का नाम उनके सम्मान में रखा गया है।

दादाभाई नौरोजी के सम्मान में लंदन के Rosebery Avenue में Finsbury Town Hall के प्रवेश द्वार पर एक पट्टिका भी मिल सकती है। वर्ष 2014 में, United Kingdom के उप प्रधानमंत्री, निक क्लेग ने दादाभाई नौरोजी पुरस्कार का उद्घाटन किया। अहमदाबाद में इंडिया पोस्ट ने भी 29 दिसंबर, 2017 को उनकी मृत्यु की शताब्दी वर्ष को याद करते हुए “भारत के ग्रैंड ओल्ड मैन” को समर्पित एक डाक टिकट जारी किया।

नौरोजी ने ‘पावर्टी एण्ड अनब्रिटिश रूल इन इण्डिया’ नामक पुस्तक भी लिखी।

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