जिस समय राजेन्द्र काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम. ए. कर रहे रहे थे तब उनकी मुलाकात बंगाल के क्रांतिकारी ‘युगांतर’ दल के नेता शचीन्द्रनाथ सान्याल से हुई।
राजेंद्र का देश-प्रेम देख शचीन्द्रनाथ सान्याल ने इन्हें अपने साथ शामिल कर लिया और बनारस से निकलने वाली पत्रिका बंग वाणी के सम्पादन कि जिम्मेदारी इनको दे दी।
इसके साथ अनुशीलन समिति की वाराणसी शाखा के सशस्त्र विभाग का कार्य भी इनको दिया गया। इनकी कार्य कुशलता देख कर इन्हें हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन की गुप्त बैठकों में भी बुलाया जाने लगा।
आपको बता दें, काकोरी कांड की घटना 9 अगस्त 1925 को हुई थी। इस घटना मे रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह समेत अन्य दस क्रांतिकारी शामिल थे । 9 अगस्त, 1925 को काकोरी स्टेशन से एक ट्रैन चली ।
लखनऊ से 8 मील की दूरी पर चलती ट्रैन को 3 नौजवानों ने चैन खींच कर रोक दिया उनके ही साथियों ने गाडी में मौजूद सरकारी खजाना लूट लिया।उन जवानों ने बड़ी ही समझदारी से गाडी में बैठे यात्रियों को समझाया कि, उन्हें कुछ नहीं होगा सिर्फ शांती बनाये रखे।
इस बिच एक यात्री जबरदस्ती से ट्रैन से निचे उतर गया और गोली लगकर उसकी मौत हो गयी।
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| राजेंद्र लाहिड़ी |
इस घटना के बाद अंग्रेज़ो द्वारा की गयी जाँच में इन क्रांतिकारियो के शामिल होंने का राज खुल गया काकोरी कांड मे शामिल सभी क्रांतिकारियों को पुलिस ने पकड लिया । पकड़े गये सभी क्रांतिकारियो पर शासन के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने एवं खजाना लूटने का अभियोग चलाया गया।
इस कांड में लखनऊ की विशेष अदालत ने 6 अप्रैल 1927 को निर्णय सुनाया, जिसमे राजेन्द्र लाहिड़ी, रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह तथा अशफाक उल्लाह को फांसी की सजा हुई ।
काकोरी काण्ड के बाद बिस्मिल ने लाहिड़ी को बम बनाने का प्रशिक्षण लेने बंगाल भेज दिया। कलकत्ता में कुछ दूर स्थित दक्षिणेश्वर में इन्होंने बम बनाने का सामान इकट्ठा किया इस समय किसी साथी की असावधानी से एक बम फट गया और वह धमाका सुनकर पुलिस वहा आ गयी। और सबको गिरफ्तार कर लिया गया उन पर मुकदमा दायर किया और 10 वर्ष की सजा हुई जो अपील करने पर 5 वर्ष कर दी गयी।
तमाम अपीलों व दलीलों के बावजूद सरकार नहीं मानी और अंत मे पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल,अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह- एक साथ तीन व्यक्तियों को फाँसी दी गयी।
इनकी फांसी को लेकर जनता ने अंग्रेज़ो पर दबाव डालना शुरू किया।इस दबाव के कारण अंग्रेजी सरकार घबराने लगी थी इसलिए सरकार ने राजेन्द्रनाथ को समय से पहले ही, 17 दिसंबर 1927 को फांसी दे दी गयी थी इस तरह राजेंद्र जी ने ख़ुशी ख़ुशी फन्दा चूमने से पहले वंदे मातरम् की हुंकार भरते हुए कहा था – “मैं मर नहीं रहा हूँ, बल्कि स्वतन्त्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ.”

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