12 अक्टूबर 2023

रास बिहारी बोस को आखिर क्यों जाना पड़ा जापान #Rasbiharibose

रास बिहारी बोस भारत के प्रमुख क्रांतिकारी नेता थे. उनका ग़दर क्रांति और आजाद हिन्द फौज की स्थापना में भी योगदान था। रासबिहारी बोस का जन्म 25 मई 1886 को बंगाल में बर्धमान जिले के सुबालदह गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम विनोद बिहारी बोस और माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। 1889 में जब उनकी माताजी की मृत्यु हुई, उस समय वे बहुत छोटे बच्चे थे, अत: उनकी मौसी वामा सुंदरी ने उनका पालन पोषण किया रास बिहारी बोस की आरंभिक पढाई सुबालदाह में उनके दादाजी, कालीचरण की निगरानी में तथा आगे की शिक्षा डुप्लेक्स महाविद्यालय, चंदननगर में हुई। 1789 की फ्रेंच क्रांति ने रास बिहारी पर गहरा प्रभाव छोड़ा,प्रिंसिपल चारु चंद्र रॉय ने उन्हें क्रांतिकारी राजनीति में प्रेरित किया। बाद में ये कोलकाता के "मॉर्टन स्कूल" में भी पढे। क्रान्तिकारी गतिविधियों में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। प्रारम्भ में रासबिहारी बोस ने देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में कुछ समय तक हेड क्लर्क के रूप में काम किया।उनके द्वारा चलाये जा रहे क्रांतिकारी गतिविधियों का मुख्य केंद्र “वाराणसी” था यहाँ से उन्होंने सारे गुप्त क्रांतिकारी आंदोलनों का संचालन किया। इसी दौरान ये युगान्तर क्रान्तिकारी संगठन मे शामिल हो गये यही इनकी मुलाकात अमरेन्द्र चटर्जी से हुई। जार्ज पंचम के 12 दिसंबर 1911 को होने वाले दरबार के बाद जब वायसराय लॉर्ड हार्डिंग की दिल्ली में सवारी निकाली जा रही थी तो उसकी शोभायात्रा पर बम फेंकने की योजना बनाने में रासबिहारी की प्रमुख भूमिका रही थी। मास्टर अमीरचन्द, लाला हनुमन्त सहाय, मास्टर अवध बिहारी, भाई बालमुकुन्द और बसन्त कुमार विश्वास द्वारा लार्ड हार्डिंग नामक ब्रिटिश वायसराय को जान से मार डालने की एक क्रान्तिकारी योजना थी जो सफल न हो सकी। हालांकि बसंत ने जो बम फेंका वो वायसरॉय को न लगकर महावत को लग गया। हमले के तुरंत बाद बसंत ने एक बाथरूम में जाकर कपड़े बदल लिए. वह सुंदर लड़की से अब एक नौजवान लड़का बन चुका था. नीचे आकर दोनों भीड़ में मिल गए. वायसरॉय गंभीर रूप से घायल हो गए और उन्हें फेमस डॉक्टर एसी सेन के पास ले जाया गया हालांकि रास बिहारी पकड़े नहीं जा सके। रास बिहारी बोस रात की ट्रेन से देहरादून लौट आए और अगले दिन दफ्तर में ऐसे पहुंचे जैसे कुछ हुआ ही न हो... इसके अलावा, उन्होंने वायसरॉय पर हमले की निंदा करने के लिए देहरादून के नागरिकों की एक बैठक भी बुलाई. आखिर कौन कल्पना कर सकता है कि यह वही शख्स था जो इन सबका मास्टरमाइंड था। लार्ड हार्डिंग तो बच गया किन्तु जिस हाथी पर बैठाकर दिल्ली के चाँदनी चौक में वायसराय की शानदार शाही सवारी निकाली जा रही थी उसका महावत मारा गया। पुलिस ने इस काण्ड में चारो प्रमुख क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार करके उन पर वायसराय की हत्या की साजिश का मुकदमा चलाया। इस घटना को चांदनी चौक कांड और दिल्ली कांड के नाम से जाना गया इस घटना मे लालाजी को उम्रकैद की सजा देकर अण्डमान भेज दिया गया जबकि अन्य चारो को फाँसी की सजा हुई। चांदनी चौक कांड के बाद बोस और उनके साथियों पर लाहौर षड्यंत्र कांड का मुकदमा चलाया गया. सरकार के इस झूठे मुकदमे से बचने का एक ही रास्ता था, वो था देश छोड़कर भाग जाना. पुलिस की बढ़ी सख्ती को देखते हुए रास बिहारी बोस जून 1915 में राजा पी. एन. टैगोर के नाम से जापान पहुंचे और वहां रहकर देश की आजादी के लिए काम करने लगे। उन्होंने वहां अंग्रेजी अध्यापन के साथ-साथ लेखक व पत्रकार के रूप में भी काम किया और ‘न्यू एशिया’ नामक एक समाचार पत्र निकाला। रासबिहारी बोस ने वर्ष 1916 में जापान में रहते हुए सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको की बेटी ‘तोशिको सोमा’ से विवाह किया जिससे उन्हें एक बेटा और एक बेटी हुई। इसी की बदौलत वर्ष 1923 को रास बिहारी बोस को जापान की नागरिकता मिली। जून 1942 में उन्होंने बैंकाक में इंडियन इंडीपेंडेंस लीग का दूसरा सम्मेलन बुलाया, जिसमें सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और उसका अध्यक्ष बनने के लिए आमन्त्रित किया गया। मलाया और बर्मा के मोर्चे पर जापान ने कई भारतीय युद्धबन्दियों को पकड़ा था। इन युद्धबन्दियों को इण्डियन इण्डिपेण्डेंस लीग में शामिल होने और इंडियन नेशनल आर्मी (आई०एन०ए०) का सैनिक बनने के लिये प्रोत्साहित किया गया। आई०एन०ए० इण्डियन नेशनल लीग की सैन्य शाखा के रूप में सितम्बर 1942 में गठित की गयी। इसके बाद जापानी सैन्य कमान ने रास बिहारी बोस और जनरल मोहन सिंह को आई०एन०ए० के नेतृत्व से हटा दिया लेकिन आई०एन०ए० का संगठनात्मक ढाँचा बना रहा। बाद में सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नाम से आई०एन०ए० का पुनर्गठन किया। भारत को अंग्रेजी हुकुमत से मुक्ति दिलाने का सपना लिए भारत माता का यह वीर सपूत 21 जनवरी 1945 को परलोक सिधार गया। उनकी मृत्यु से पहले, जापानी सरकार ने उन्हें ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन (द्वितीय श्रेणी) से सम्मानित किया था। 26 दिसंबर, 1967 को, डाक और तार विभाग ने राश बिहारी बोस के सम्मान में एक विशेष डाक टिकट जारी किया।

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