07 अक्टूबर 2023

Kalpana Dutta : लड़का बनकर अंग्रेजों से लोहा लेने वाली नायिका की कहानी

इस देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए हर वर्ग और समुदाय के लोगों ने कुर्बानी दी. पुरुषों के साथ महिलाओं ने भी बड़ी तादाद में ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौति दी, लेकिन उनमें कई ऐसे गुमनाम आजादी के सिपाही हैं जिनकी शायद ही कोई चर्चा होती है. उन्हीं में से एक नाम है ‘वीर महिला’ का ख़िताब पाने वाली कल्पना दत्त का, जिन्होंने भारत की आजादी में भेष बदलकर अंग्रेजों का मुकाबला किया। कल्पना दत्ता का जन्म 27 जुलाई 1913 को बंगाल प्रांत में चटगांव जिले के गांव श्रीपुर में हुआ था। इनके पिता बिनोद बिहारी दत्त एक सरकारी कर्मचारी थे। कल्पना ने चटगांव से अपनी मैट्रिक की परीक्षा पास की और 1929 मे कलकत्ता चली गईं और विज्ञान की पढाई करने के लिए बेथ्यून कॉलेज में admission ले लिया । यहाँ उन्होंने बीएससी में दाखिला लिया और क्रांतिकारियों की कहानियाँ पढने लगी। इन कहानियों ने उन पर गहरा प्रभाव डाला। वह महिला छात्र संघ से जुड़ गई जो एक अर्ध-क्रांतिकारी संगठन था जिसमें बीना दास और प्रीतिलता वाडेदार भी सक्रिय सदस्य थीं और खुद भी क्रांतिकारी कामों में रूचि लेने लगी। Kalpana Datta प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्यसेन की इंडियन रिपब्लिकन आर्मी से जुड़ी। सूर्यसेन को मास्टर दा के नाम से भी जाना जाता हैं। उनके संगठन ‘इन्डियन रिपब्लिकन आर्मी’ से जुड़कर इन्होंने अंग्रेजो की खिलाफ मोर्चा खोल दिया।1930 में इस दल ने चटगांव शास्त्रागार लूटा अंग्रेज़ो की नजर में आने पर कल्पना को पढ़ाई छोड़कर चटगांव आना पड़ा। और यहीँ से इस दल के संपर्क में रही। उनके साथ के कई क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिए गए। Kalpana Datta वेष बदलकर कलकत्ता से विस्फोटक सामग्री ले जाने लगीं और संगठन के लोगो को विस्फोटक सामग्री और हथियार पहुंचाने लगी। इन्होंने अपने साथियों को आजाद कराने का प्लान बनाया जिसके तहत जेल की दीवार को बम से उड़ाने की योजना बनाई गयी थी , लेकिन पुलिस को योजना का पता चल गया। वह वेष बदलकर घुमती फिर रही थी, लेकिन पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया, हालांकि अभियोग सिद्ध ना होने पर उन्हें छोड़ दिया गया, पुलिस ने उनके घर पर पहरा लगा दिया, लेकिन वह आंखों में धुल झोंककर भाग गई। सूर्यसेन को पुलिस ने गिरफ्तार लिया और 1933 में कल्पना भी गिरफ्तार हो गई। क्रांतिकारियों पर मुकदमा चला और 1934 में सूर्यसेन को फांसी और कल्पना दत्त को आजीवन कारावास की सजा हो गई। 1937 में जब पहली बार प्रदेशों में भारतीय मंत्रिमंडल बने, तब महात्मा गांधी , रवीन्द्र नाथ टैगोर आदि के विशेष प्रयत्नों से 1939 में कल्पना जेल से रिहा हो गईं। जेल से रिहा होने के बाद इन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की कल्पना दत्ता ने 1940 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और इसके बाद राजनीति में कदम रखा. और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गईं. जेल में रहते हुए उनकी कई कम्युनिस्ट नेताओं से मुलाकात हुई थी. उन्होंने मार्क्सवादी विचारों को भी पढ़ा था. वो उनके विचारों से काफी प्रभावित हुई . कल्पना दत्ता ने 1943 भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पूरन चंद जोशी के साथ शादी कर ली और वह कल्पना दत्ता से कल्पना जोशी बन गईं।। उनके दो बेटे थे: चाँद और सूरज उन्होंने बंगाल अकाल और बंगाल विभाजन के दौरान एक राहत कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया आगे 1943 में ही बंगाल के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने कल्पना को अपना उम्मीदवार बनाया. लेकिन वो चुनाव जीतने में असफल रहीं। आगे कुछ मतभेदों के चलते इन्होंने अपने पति से अलग रहने का फैसला किया और बंगाल से दिल्ली आ गईं और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से इस्तीफ़ा देकर राजनीति से खुद को अलग कर लिया. बाद मे कल्पना ने चटगांव लूट पर आधारित बंगाली में अपनी आत्मकथा भी लिखी। जिसका अंग्रेजी में अनुवाद अरुण बोस और निखिल चक्रवर्ती ने किया था। कल्पना दत्ता ने 8 फरवरी 1995 में इस दुनिया से अलविदा कह दिया. देश ने एक जांबाज महिला को खो दिया था कल्पना पर एक किताब ‘डू एंड डाई:चटगाम विद्रोह; लिखी गई। साल 1979 में कल्पना दत्त की बहादुरी और आजादी में दिए गए योगदान को देखते हुए पुणे में ‘वीर महिला’ के ख़िताब से सम्मानित किया गया। 2010 में, हिंदी फिल्म 'खेलें हम जी जान से' में दीपिका पादुकोण ने कल्पना दत्ता की भूमिका निभाई और अभिषेक बच्चन ने सूर्य सेन की,जो चटगांव शस्त्रागार छापे और उसके परिणामों पर आधारित थी।

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