खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर, 1889 को बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। इनके पिता त्रिलोकक्यनाथ बसु तहसीलदार थे। इनकी मां लक्ष्मीप्रिया देवी थी। बहुत कम उम्र में इन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया था। इनकी बड़ी बहन ने ही उनकी परवरिश की।
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| खुदीराम बोस |
1905 में बंगाल का विभाजन होने के बाद खुदीराम बोस देश को आजादी दिलाने के लिए आंदोलन में कूद पड़े। सत्येन्द्र बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया।खुदीराम बोस स्कूल के दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने लग गए थे।
इन्होंने 9वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। स्कूल छोड़ने के बाद खुदीराम रिवोल्यूशनरी पार्टी मे शामिल हो गए ।
1906 में मिदनापुर में एक मेले का आयोजन किया गया। सत्येंद्रनाथ बोस ने वन्दे मातरम् शीर्षक से अंग्रेज़ी शासन के विरोध का पर्चा छपवाया। खुदीराम बोस को मेले में इन पर्चो को बांटने की जिम्मेदारी दी गयी ।
अंग्रेज़ों के पिट्ठू रामचरण सेन ने उनको शासन विरोधी पर्चा बांटते देख लिया, और इसकी सूचना एक सिपाही को दे दी। पुलिस के एक सिपाही ने खुदीराम को पकड़ने का प्रयास किया। खुदीराम ने उस सिपाही के मुंह पर एक घूंसा जड़ दिया। तभी वहां दूसरे पुलिस वाले पहुंच गए। उन सबने मिलकर खुदीराम बोस को पकड़ लिया।सिपाहियों की पकड़ थोड़ी ढ़ीली होते ही खुदीराम बोस वहां से ग़ायब हो गए।
8 अप्रैल, 1908 को 17 वर्षीय खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी को डगलस किंग्सफ़ोर्ड की हत्या का दायित्व सौंपा गया। इससे पहले क्रांतिकारियों ने किंग्सफ़ोर्ड को एक पार्सल बम भेजकर मारने की कोशिश की लेकिन वो बच गया ।
क्रांतिकारियों की इन गतिविधियों से डरकर किंग्सफ़ोर्ड ने अपना तबादला बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में करवा लिया।
18 अप्रैल, 1908 को खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी मुज़फ़्फ़रपुर पहुंच गए। वहां दोनों एक धर्मशाला में ठहरे। दोनों युवाओं ने किंग्सफ़ोर्ड के आवास और उसकी दिनचर्या की निगरानी शुरू कर दी।
खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी को इस बात का अंदाज़ा हो गया कि किंग्सफ़ोर्ड हर रात विक्टोरिया बग्घी में अपनी पत्नी के साथ स्टेशन क्लब आते हैं।
दोनों ने योजना बनाई कि क्लब से वापसी के समय किंग्सफोर्ड की बग्घी पर बम फेंककर उनकी हत्या कर दी जाए।
30 अप्रैल, 1908 को किंग्सफ़ोर्ड अंग्रेज़ बैरिस्टर प्रिंगल कैनेडी की पत्नी और बेटी के साथ ब्रिज खेल रहे थे। शाम साढ़े आठ बजे जब खेल ख़त्म हुआ तो श्रीमती कैनेडी और ग्रेस कैनेडी घोड़े की बग्घी पर सवार हुईं, ये बग्घी किंग्सफ़ोर्ड की बग्घी से बहुत कुछ मिलती जुलती थी।
जब बग्घी किंग्सफ़ोर्ड के घर के पूर्वी गेट पर पहुंची तो सड़क के दक्षिणी छोर पर छिपे हुए दो लोग उसकी तरफ़ दौड़े। उन्होंने बग्घी के अंदर बम फेंक दिया."जिस मे श्रीमती कैनेडी और ग्रेस कैनेडी की मौत हो गई ।
खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी वहां से भाग तो निकले लेकिन जल्दबाज़ी में खुदीराम के जूते वहीं रह गए। प्रशासन ने दोनों पर 5000 रुपए के ईनाम की घोषणा भी की ।
खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी रेल पटरियों के किनारे भागते हुए समस्तीपुर के पास वैनी रेलवे स्टेशन पहुंच गए। वैनी स्टेशन के बाहर दोनों क्रांतिकारी एकदूसरे से गले मिलकर इस संकल्प के साथ अलग-अलग दिशाओं में चल पड़े कि अगर जीवन रहा तो कलकत्ता में फिर मिलेंगे।
1 मई, 1908 की सुबह वैनी रेलवे स्टेशन के पास खुदीराम पानी पीकर विश्राम के लिए बैठे ही थे कि उन्होंने सुना कि लोग आपस में रात की घटना की चर्चा कर रहे हैं। उसमें से किसी ने कहा, 'वो किंग्सफ़ोर्ड तो नहीं मरा इस बम से, लेकिन अंग्रेज़ मां-बेटी मारी गई।
"यह सुनकर खुदीराम को धक्का लगा। वहां पर अंग्रेज़ पुलिस के कुछ सिपाही और जासूस भी घूम रहे थे। खुदीराम की थकावट, उत्तेजना, उम्र के साथ-साथ उसका बांग्ला बोलने का लहज़ा और नंगे पांव होने के कारण संदेह में खुदीराम को फ़ौरन पकड़ लिया गया।
उधर प्रफ्फुल चाकी भी भाग-भाग कर भूक-प्यास से तड़प रहे थे। 1 मई को ही त्रिगुनाचरण नामक ब्रिटिश सरकार में कार्यरत एक आदमी ने उनकी मदद की और रात को ट्रेन में बैठाया पर रेल यात्रा के दौरान ब्रिटिश पुलिस में कार्यरत एक सब-इंस्पेक्टर को शक हो गया और उसने मुजफ्फरपुर पुलिस को इस बात की जानकारी दे दी। जब चाकी हावड़ा के लिए ट्रेन बदलने के लिए मोकामाघाट स्टेशन पर उतरे तब पुलिस पहले से ही वहां मौजूद थी। अंग्रेजों के हाथों मरने के बजाए चाकी ने खुद को गोली मार ली और शहीद हो गए।
खुदीराम बोस पर अपर सत्र न्यायाधीश एच डब्सू कॉर्नडफ़ की अदालत में हत्या का मुक़दमा चलाया गया। जब खुदीराम को अदालत में लाया जाता था तो सड़क के दोनों तरफ़ खड़े लोग ज़िन्दाबाद और वन्दे मातरम के नारों के साथ उनका स्वागत करते थे। 13 जून, 1908 को अदालत ने खुदीराम बोस को फांसी की सज़ा सुनाई।
जब खुदीराम शहीद हुए थे तब उनकी उम्र 18 साल 8 महीने और 8 दिन थी। 11 अगस्त 1908 को उन्हें मुजफ्फरपुर जेल में फांसी दे दी गई। जब खुदीराम शहीद हुए थे उसके बाद विद्यार्थियों और अन्य लोगों ने शोक मनाया। कई दिन तक स्कूल, कॉलेज सभी बन्द रहे और नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे, जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था।

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