09 मार्च 2023

मन्मथनाथ गुप्त: काकोरी कांड में शामिल वह देशभक्त, जिसने आजीवन की देश की सेवा!

 मन्मथनाथ गुप्त भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी तथा प्रसिद्ध लेखक थे।मात्र 13 वर्ष की उम्र में वे स्वतन्त्रता संग्राम में कूद गये और जेल गये। बाद में वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के सक्रिय सदस्य भी बने और 17 वर्ष की आयु में 1925 में हुए काकोरी काण्ड में सक्रिय रूप से भाग लिया। 

    
मन्मथनाथ गुप्त



मन्मथनाथ गुप्त का जन्म वाराणसी में 7 फरवरी 1908 को हुआ। इनके पिता का नाम वीरेश्वर गुप्त था जो नेपाल के विराटनगर के स्कूल मे हेडमास्टर थे।

मन्मथनाथ गुप्त की प्रारंभिक शिक्षा नेपाल से हुयी उसके बाद ये वाराणसी चले आये ।1921 में ब्रिटिश युवराज के भारत आने पर एक कार्यक्रम मे उसके स्वागत का आयोजन किया जाना था लाला लाजपत राय इस कार्यक्रम का विरोध करना चाहते थे इस विरोध मे मन्मथनाथ भी शामिल हो गए ।

मन्मथनाथ ने ब्रिटिश युवराज का बहिष्कार किया और इसके विरोश में पर्चे बाटने लगे तभी उन्हें ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया ।और तीन महीने की सजा सुनाई गयी।जेल से छूटने पर इन्होंने काशी विद्यापीठ में प्रवेश लिया और वहाँ से मैट्रिक की परीक्षा पास की।

मन्मथनाथ हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन जो ब्रिटिश विरोधी क्रांतिकारी गुट था मे सक्रिय रूप से भाग लेने लगे ।इन्होंने कॉंग्रेस की सदस्यता भी ग्रहण की थीं लेकिन चौरी चौरा घटना के बाद इन्होंने कॉंग्रेस छोड़ दी।क्रान्तिकारियों द्वारा चलाए जा रहे आजादी के आन्दोलन को गति देने के लिये धन की तत्काल जरूरत थी । 

8 अगस्त को शाहजहाँपुर में राम प्रसाद बिस्मिल के घर बैठक हुई और अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनायी थी। अगले ही दिन 9 अगस्त 1925 को शाहजहाँपुर शहर के रेलवे स्टेशन से बिस्मिल के नेतृत्व में कुल 10 लोग, जिसमें अशफाक उल्ला खाँ, मुरारी शर्मा , बनवारी लाल, राजेन्द्र लाहिडी, शचीन्द्रनाथ बख्शी , केशव चक्रवर्ती , चन्द्रशेखर आजाद , मन्मथनाथ गुप्त और मुकुन्दी लाल शामिल थे 8 डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर रेलगाड़ी में सवार हुए। 

इन क्रान्तिकारियों के पास पिस्तौल के अतिरिक्त जर्मनी के बने चार माउजर भी थे जिनके बट में कुन्दा लगा लेने से वह छोटी आटोमेटिक रायफल की तरह लगते थे । इन माउजरों की मारक क्षमता भी अधिक होती थी उन दिनों ये माउजर आज की ए०के०-47 रायफल की तरह चर्चित हुआ करते थे। लखनऊ से पहले काकोरी रेलवे स्टेशन पर रुक कर जैसे ही गाड़ी आगे बढी, क्रान्तिकारियों ने चेन खींचकर उसे रोक लिया और गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया। पहले तो उसे खोलने की कोशिश की गयी किन्तु जब वह नहीं खुला तो अशफाक उल्ला खाँ ने अपना माउजर मन्मथनाथ को पकडा कर बक्सा तोडने लगे । अनजाने मे मन्मथनाथ से गोली चल गयी जो अहमद अली नाम का एक रेल-यात्री को लगी जिससे वह मौके पर ही मर गया ।

काकोरी डक़ैती” को लेकर अंग्रेजी हुकूमत पागल सी हो गयी और निर्दोषों को पकड़कर जेलों में ठूँसना प्रारम्भ कर दिया 26 सितम्बर 1925 को बिस्मिल के साथ पूरे देश में 40 से भी अधिक लोगों को काकोरी डकैती मामले में गिरफ्तार कर लिया गया इस गिरफ्तारी में मन्मथनाथ भी पकडे गए थे।

इस डकैती कांड में उनके ऊपर कई दिनों तक मुकदमा चला और आखिर में अदालत ने इन्हें नाबालिक होने के कारण 14 वर्ष जेल की सजा सुनाई ।

विज्ञान भवन, नई दिल्ली में "भारत और विश्व साहित्य पर प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी" में मन्मथनाथ गुप्त भी उपस्थित थे। एक भारतीय प्रतिनिधि ने जब राम प्रसाद 'बिस्मिल' पर "कलम और पिस्तौल के पुरोधा - पं० रामप्रसाद बिस्मिल" शीर्षक से एक शोधपत्र प्रस्तुत किया तो मनमथनाथ बहुत खुश हुए और लेखक को शाबाशी देते हुए कहा - "आपने तो आज साहित्यकारों की संसद में भगत सिंह की तरह विस्फोट कर दिया!"


मन्मथनाथ ने अनेक किताबें भी लिखी जैसे 

भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास’

‘क्रान्ति युग के अनुभव’

‘चंद्रशेखर आज़ाद’

‘विजय यात्रा’

‘यतींद्रनाथ दास’

‘कांग्रेस के सौ वर्ष

‘कथाकार प्रेमचंद’

‘प्रगतिवाद की रूपरेखा’

साहित्यकला समीक्षा 

19 दिसम्बर 1997 में उनका interview DD नेशनल चैनल पर "सरफरोशी की तमन्ना" नामक कार्यक्रम मे लिया गया था इस interview में मनमथ नाथ गुप्त नें 9 अगस्त 1925 को अपनी गलती स्वीकार की जिसमे इनके द्वारा अहमद अली नाम का एक रेल-यात्री इनकी बंदूक से मारा गया उस एक गलती के कारण पंडित राम प्रसाद बिस्मिल सहित चार क्रांतिकारियों को फांसी पर लटका दिया गया था।

मनमथ नाथ गुप्त का निधन 92 वर्ष की आयु मे दिपावली के दिन 26 अक्टूबर 2000 कों नयी दिल्ली मे हुआ ।





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