22 अप्रैल 2023

प्रफुल्लचंद्र चाकी : देश पर मर मिटने वालों में एक नाम यह भी है !

 प्रफुल्ल चाकी का जीवनकाल सिर्फ 19 साल का था, इतनी कम उम्र में वे अपने देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। प्रफुल्ल चाकी के जीवन से हमें पता चलता है कि वो बहुत हिम्मती, आत्मविश्वासी और देशप्रेमी व्यक्ति थे।

प्रफुल्ल चाकी

प्रफुल्ल चाकी का जन्म उत्तरी बंगाल के बोगरा जिले (जो अब बांग्लादेश में है) के बिहारी गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम राजनारायण चाकी और माता का नाम स्वर्णमयी देवी था प्रफुल्ल चाकी अपने 5 भाइयों में सबसे छोटे थे। प्रफुल्ल जब दो वर्ष के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया। उनकी माता ने बहुत कठिनाईयो से प्रफुल्ल का पालन-पोषण किया।

इनकी प्रारम्भिक शिक्षा रंगपुर जिला स्कूल से हुई। कक्षा 9 वीं तक इन्होने इसी स्कूल में पढ़ाई की थी।

प्रफुल्ल चाकी को दिनेश चंद्र राय के नाम से भी जाना जाता था ।विद्यार्थी जीवन में ही प्रफुल्ल स्वामी महेश्वरानन्द द्वारा बनाए गए गुप्त क्रांतिकारी संगठन में शामिल हो गये । 

बंगाल विभाजन विरोध के आन्दोलन में प्रफुल्ल जी ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। वे उस समय रंगपुर जिला स्कूल में कक्षा 9 के छात्र थे। प्रफुल्ल को आन्दोलन में भाग लेने के कारण उनके विद्यालय से निकाल दिया गया।

अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद वे अपने बड़े भाई प्रताप चंद्र चाकी के साथ रंगपुर चले गए। रंगपुर नैशनल स्कूल में जितेंद्रनारायण रॉय, अबिनाश चक्रवर्ती, इशान चंद्र चक्रवर्ती जैसे क्रांतिकारियों के साथ प्रफुल्ल चाकी भी क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने लगे  

चाकी जब रंगपुर में थे, तब वे बारिन घोष से मिले, जो युगांतर बंगाली साप्ताहिक के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। घोष ने प्रफुल्ल चाकी को युगांतर समूह में शामिल होने के लिए कलकत्ता जाने के लिए राज़ी कर लिया। प्रफुल्ल का पहला कार्य सर जोसेफ़ बैंपफ़ील्ड फ़ुलर को गोली मारना था, जो पूर्वी बंगाल और असम के नए प्रान्त के पहले उप राज्यपाल थे। दुर्भाग्य से, योजना पूरी नहीं हो पाई, क्योंकि सर जोसेफ़ के यात्रा कार्यक्रम में अंतिम समय में एक बदलाव किया गया था। 

प्रफुल्ल को एक और अवसर दिया गया, जहाँ उन्हें और खुदीराम बोस को बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफ़ोर्ड की हत्या करने के लिए चुना गया।

कोलकाता का चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफोर्ड क्रांतिकारियों को अपमानित करने और उन्हें दण्ड देने के लिए बहुत बदनाम था। क्रांतिकारियों ने डगलस किंग्सफोर्ड को जान से मारने का निर्णय लिया। ब्रिटिश सरकार ने किंग्सफोर्ड के प्रति जनता के आक्रोश को भाँप कर उसकी सुरक्षा की दृष्टि से उसे सेशन जज बनाकर मुजफ्फरपुर भेज दिया। दोनों क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस उसके पीछे-पीछे मुजफ्फरपुर पहुँच गए। दोनों ने किंग्सफोर्ड की गतिविधियों का बारीकी से अध्ययन किया। इसके बाद 30 अप्रैल 1908 को किंग्सफोर्ड पर उस समय बम फेंक दिया जब वह बग्घी पर सवार होकर यूरोपियन क्लब से बाहर निकल रहा था। लेकिन जिस बग्घी पर बम फेंका गया था उस पर किंग्सफोर्ड नहीं था बल्कि बग्घी पर दो यूरोपियन महिलाएँ सवार थीं। वे दोनों इस हमले में मारी गईं।

दोनों क्रांतिकारियों ने समझ लिया कि वे किंग्सफोर्ड को मारने में सफल हो गए हैं। वे दोनों घटनास्थल से भाग निकले। प्रफुल्ल चाकी ने समस्तीपुर पहुँच कर कपड़े बदले और टिकिट खरीद कर रेलगाड़ी में बैठ गए। दुर्भाग्य से उसी में पुलिस का सब इंस्पेक्टर नंदलाल बनर्जी बैठा था। उसने प्रफुल्ल चाकी को गिरफ्तार करने के उद्देश्य से अगली स्टेशन को सूचना दे दी। स्टेशन पर रेलगाड़ी के रुकते ही प्रफुल्ल को पुलिस ने पकड़ना चाहा लेकिन वे बचने के लिए दौड़ पडे। परन्तु जब प्रफुल्ल ने देखा कि वे चारों ओर से घिर गए हैं तो उन्होंने अपनी रिवाल्वर से गोली चलाकर अपनी जान दे दी। यह घटना 1 मई 1908 की है। बिहार के मोकामा स्टेशन के पास प्रफुल्ल चाकी की मौत के बाद पुलिस उपनिरीक्षक एनएन बनर्जी ने चाकी का सिर काट कर उसे सबूत के तौर पर मुजफ्फरपुर की अदालत में पेश किया। यह अंग्रेज शासन की जघन्यतम घटनाओं में शामिल है।


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