24 अप्रैल 2023

आजाद भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री रहीं सुचेता कृपलानी के बारे में जानें

सुचेता कृपलानी आजाद भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री और एक प्रतिष्ठित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थीं।

सुचेता कृपलानी


सुचेता कृपलानी का जन्म 25 जून, 1908 को हरियाणा के अंबाला में हुआ था। सुचेता के पिता का नाम एस.एन. मजुमदार था, जो ब्रिटिश सरकार के अधीन एक डॉक्टर थे। हालांकि इसके बावजूद वह एक राष्ट्रवादी व्यक्ति थे।

सुचेता कृपलानी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के इन्द्रप्रस्थ और सेंट स्टीफन कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद सुचेता ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में व्याख्याता के पद पर कार्य करना शुरू किया। शिक्षा पूर्ण होने के बाद उन्होंने बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में अध्यापिका के रूप में कार्य किया।

साल 1936 में सुचेता की शादी आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी के साथ हुई। इसके बाद सुचेता स्वतंत्रता की लड़ाई की ओर पूरी तरह से सक्रिय हो गईं। सुचेता कृपलानी महात्मा गांधी जी के विचारों से प्रभावित थी।

वह अरुणा आसफ अली और ऊषा मेहता के साथ आजादी के आंदोलन में शामिल हुई। सुचेता कृपलानी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में बढ़-चढ़ कर योगदान दिया था। और नोआखली में महात्मा गांधी के साथ दंगा पीडित इलाकों में पीड़ित महिलाओं की मदद भी की। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने हड़ताली कर्मचारियों को मजबूत इच्छाशक्ति के साथ हड़ताल वापस लेने पर मजबूर किया। वह एक ऐसी महिला थीं, जिसमें जुझारूपन कूट-कूट कर भरा था। उन्होंने अपने जुझारूपन और सूझ-बूझ का उदाहरण भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दिया।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजी सरकार ने सारे पुरुष नेताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया तब सुचेता कृपलानी ने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए कहा, ‘बाकियों की तरह मैं भी जेल चली गई तो आंदोलन को आगे कौन बढ़ाएगा।’ इस दौरान भूमिगत होकर उन्होंने कांग्रेस का महिला विभाग बनाया और पुलिस से छुपते-छुपाते दो साल तक आंदोलन भी चलाया। उन्होंने इसके अंतर्गत ‘अंडरग्राउण्ड वालंटियर फोर्स’ भी बनाई और महिलाओं और लड़कियों को ड्रिल, लाठी चलाना, प्राथमिक चिकित्सा और आत्मरक्षा के लिए हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी दी।

जब देश का संविधान बनाया गया। तब उसके लिए अलग सभा का गठन किया गया। उस दौरान सुचेता ने महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने भारत के संविधान में महिलाओं के अधिकारों को और मजबूत बनाया।

आजादी की जंग में सुचेता कृपलानी ने एक अहम भूमिका निभाई। और उस दौरान ही वो राजनीति में सक्रिय हुईं। साल 1952 में सुचेता कृपलानी लोकसभा की सदस्य के रूप में निर्वाचित हुईं।

साल 1957 में दिल्ली सरकार की विधानसभा का सदस्य बनाया गया, जहां उन्हें लघु उद्योग मंत्रालय दिया गया। 

साल 1962 में सुचेता कानपुर से विधानसभा सदस्य चुनी गईं, इसी के साथ साल 1963 में देश को पहली महिला मुख्यमंत्री मंत्री मिली।कार्यकाल के दौरान साल 1967 में एक बार फिर सुचेता ने गोंडा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीता और साल 1971 में सुचेता ने राजनीति से संन्यास ले लिया।

1 दिसंबर, 1974 को 70 साल की आयु में नई दिल्ली में उनका निधन हो गया। अपने शोक संदेश में श्रीमती इंदिरा गांधी ने कहा था। “सुचेता जी एक ऐसे दुर्लभ साहस और चरित्र की महिला थीं, जिनसे भारतीय महिलाओं को सम्मान मिलता है।” 

और स्वतंत्रता आंदोलन में श्रीमती सुचेता कृपलानी के योगदान को हमेशा याद किया जाएगा।

22 अप्रैल 2023

प्रफुल्लचंद्र चाकी : देश पर मर मिटने वालों में एक नाम यह भी है !

 प्रफुल्ल चाकी का जीवनकाल सिर्फ 19 साल का था, इतनी कम उम्र में वे अपने देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। प्रफुल्ल चाकी के जीवन से हमें पता चलता है कि वो बहुत हिम्मती, आत्मविश्वासी और देशप्रेमी व्यक्ति थे।

प्रफुल्ल चाकी

प्रफुल्ल चाकी का जन्म उत्तरी बंगाल के बोगरा जिले (जो अब बांग्लादेश में है) के बिहारी गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम राजनारायण चाकी और माता का नाम स्वर्णमयी देवी था प्रफुल्ल चाकी अपने 5 भाइयों में सबसे छोटे थे। प्रफुल्ल जब दो वर्ष के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया। उनकी माता ने बहुत कठिनाईयो से प्रफुल्ल का पालन-पोषण किया।

इनकी प्रारम्भिक शिक्षा रंगपुर जिला स्कूल से हुई। कक्षा 9 वीं तक इन्होने इसी स्कूल में पढ़ाई की थी।

प्रफुल्ल चाकी को दिनेश चंद्र राय के नाम से भी जाना जाता था ।विद्यार्थी जीवन में ही प्रफुल्ल स्वामी महेश्वरानन्द द्वारा बनाए गए गुप्त क्रांतिकारी संगठन में शामिल हो गये । 

बंगाल विभाजन विरोध के आन्दोलन में प्रफुल्ल जी ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। वे उस समय रंगपुर जिला स्कूल में कक्षा 9 के छात्र थे। प्रफुल्ल को आन्दोलन में भाग लेने के कारण उनके विद्यालय से निकाल दिया गया।

अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद वे अपने बड़े भाई प्रताप चंद्र चाकी के साथ रंगपुर चले गए। रंगपुर नैशनल स्कूल में जितेंद्रनारायण रॉय, अबिनाश चक्रवर्ती, इशान चंद्र चक्रवर्ती जैसे क्रांतिकारियों के साथ प्रफुल्ल चाकी भी क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने लगे  

चाकी जब रंगपुर में थे, तब वे बारिन घोष से मिले, जो युगांतर बंगाली साप्ताहिक के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। घोष ने प्रफुल्ल चाकी को युगांतर समूह में शामिल होने के लिए कलकत्ता जाने के लिए राज़ी कर लिया। प्रफुल्ल का पहला कार्य सर जोसेफ़ बैंपफ़ील्ड फ़ुलर को गोली मारना था, जो पूर्वी बंगाल और असम के नए प्रान्त के पहले उप राज्यपाल थे। दुर्भाग्य से, योजना पूरी नहीं हो पाई, क्योंकि सर जोसेफ़ के यात्रा कार्यक्रम में अंतिम समय में एक बदलाव किया गया था। 

प्रफुल्ल को एक और अवसर दिया गया, जहाँ उन्हें और खुदीराम बोस को बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफ़ोर्ड की हत्या करने के लिए चुना गया।

कोलकाता का चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफोर्ड क्रांतिकारियों को अपमानित करने और उन्हें दण्ड देने के लिए बहुत बदनाम था। क्रांतिकारियों ने डगलस किंग्सफोर्ड को जान से मारने का निर्णय लिया। ब्रिटिश सरकार ने किंग्सफोर्ड के प्रति जनता के आक्रोश को भाँप कर उसकी सुरक्षा की दृष्टि से उसे सेशन जज बनाकर मुजफ्फरपुर भेज दिया। दोनों क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस उसके पीछे-पीछे मुजफ्फरपुर पहुँच गए। दोनों ने किंग्सफोर्ड की गतिविधियों का बारीकी से अध्ययन किया। इसके बाद 30 अप्रैल 1908 को किंग्सफोर्ड पर उस समय बम फेंक दिया जब वह बग्घी पर सवार होकर यूरोपियन क्लब से बाहर निकल रहा था। लेकिन जिस बग्घी पर बम फेंका गया था उस पर किंग्सफोर्ड नहीं था बल्कि बग्घी पर दो यूरोपियन महिलाएँ सवार थीं। वे दोनों इस हमले में मारी गईं।

दोनों क्रांतिकारियों ने समझ लिया कि वे किंग्सफोर्ड को मारने में सफल हो गए हैं। वे दोनों घटनास्थल से भाग निकले। प्रफुल्ल चाकी ने समस्तीपुर पहुँच कर कपड़े बदले और टिकिट खरीद कर रेलगाड़ी में बैठ गए। दुर्भाग्य से उसी में पुलिस का सब इंस्पेक्टर नंदलाल बनर्जी बैठा था। उसने प्रफुल्ल चाकी को गिरफ्तार करने के उद्देश्य से अगली स्टेशन को सूचना दे दी। स्टेशन पर रेलगाड़ी के रुकते ही प्रफुल्ल को पुलिस ने पकड़ना चाहा लेकिन वे बचने के लिए दौड़ पडे। परन्तु जब प्रफुल्ल ने देखा कि वे चारों ओर से घिर गए हैं तो उन्होंने अपनी रिवाल्वर से गोली चलाकर अपनी जान दे दी। यह घटना 1 मई 1908 की है। बिहार के मोकामा स्टेशन के पास प्रफुल्ल चाकी की मौत के बाद पुलिस उपनिरीक्षक एनएन बनर्जी ने चाकी का सिर काट कर उसे सबूत के तौर पर मुजफ्फरपुर की अदालत में पेश किया। यह अंग्रेज शासन की जघन्यतम घटनाओं में शामिल है।


15 अप्रैल 2023

शचीन्द्रनाथ बख्शी का जीवन परिचय और विचार।

एक महान क्रान्तिकारी का कहना था कि, गुलाम देश में जीवित रहने की अपेक्षा मृत्यु की गोद में सो जाना अच्छा है।” और यह कहना था शचीन्द्रनाथ बख्शी का ।

शचीन्द्रनाथ बख्शी


बख्शी जी का जन्म 25 दिसम्बर 1904 को वाराणसी में हुआ था। उनके माता-पिता बंगाल के निवासी थे, किन्तु तीर्थस्थान के प्रेमी होने के कारण काशी में जाकर बस गये थे। काशी में ही बख्शी जी की शिक्षा-दीक्षा भी हुई थी। उन्होंने काशी के प्रिन्स कालेज से इन्टर की परीक्षा पास की थी।


बख्शी जी व्यायाम के बड़े प्रेमी थे। अपने विद्यार्थी जीवन में ही वे व्यायाम किया करते थे। जब वे बड़े हुए, तो उनकी व्यायाम-निष्ठा अधिक बढ़ गई। उस समय वे अपने साथियों को भी व्यायाम करने की शिक्षा दिया करते थे।


 वे विद्यार्थी जीवन में ही सोचा करते थे, जिस प्रकार आनन्दमठ के संन्यासियों ने गोरों को देश से बाहर निकालने का प्रयत्न किया था, बड़े होने पर उसी प्रकार का प्रयत्न वे भी करेंगे


पढ़ाई छोड़कर कुछ क्रान्तिकारी कार्य करने की सोची। इस उद्देश्य से उन्होंने पहले सेण्ट्र्ल हेल्थ इम्प्रूविंग सोसाइटी बनायी फिर सेण्ट्रल हेल्थ यूनियन का गठन किया। हेल्थ यूनियन के बैनर तले उन्होंने बनारस के नवयुवकों को संगठित किया और तैराकी की कई प्रतियोगिताएँ आयोजित कीं। 1923 में दिल्ली की स्पेशल काँग्रेस के दौरान वे बिस्मिल के सम्पर्क में आये। उसके बाद वे उनकी क्रान्तिकारी पार्टी एच॰आर॰ए॰ हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन में शामिल हो गये। कुछ दिनों बाद झाँसी से निकलने वाले एक अखबार का सम्पादन किया।


ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध सशस्त्र क्रान्ति के लिये गठित हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के सक्रिय सदस्य भी रहे। 


रिपब्लिकन एसोसियेशन सारे भारत में क्रांति की आग जला कर ब्रिटिश शासन को भगाना चाहती थी। इस कार्य के लिए उसे धन की आवश्यकता थी। धन के अभाव को दूर करने के लिए पहले तो गांवों में डाके डाले गये. फिर सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई गई।

   इसके अलावा इन्होंने रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में काकोरी काण्ड में भाग लिया था और फरार हो गये। बख्शी ने काकोरी काण्ड में प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया था परन्तु पुलिस के हाथ नहीं आये। घर से फरार हो गये और बिहार में पार्टी का कार्य छुपे तौर पर करते रहे। 

बख्शी को भागलपुर से पुलिस ने उस समय गिरफ्तार किया जब काकोरी-काण्ड के मुख्य मुकदमे का फैसला सुनाया जा चुका था। 

स्पेशल जज जे॰आर॰डब्लू॰ बैनेट की अदालत में काकोरी षड्यन्त्र का पूरक मुकदमा दर्ज़ हुआ और 13 जुलाई 1927 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गयी। 1937 में जेल से छूटकर आये तो काँग्रेस पार्टी के लिये जी-जान से काम किया।

स्वतन्त्र भारत में काँग्रेस से उनका मोहभंग हुआ और वे जनसंघ में शामिल हो गये। उन्होंने उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव जीता और लखनऊ जाकर रहने लगे।

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में 80 वर्ष की आयु में 23 नवम्बर 1984 को उनका निधन हुआ।

शचीन्द्रनाथ बख्शी ने अपने क्रान्तिकारी संस्मरणों पर आधारित दो पुस्तकें भी लिखीं थीं जो उनके मरने के बाद ही प्रकाशित हो सकीं। दोनों पुस्तकों का विवरण इस प्रकार है: 

क्रान्ति के पथ पर: एक क्रान्तिकारी के संस्मरण और

वतन पे मरने वालों का जिसे नई दिल्ली ग्लोबल हारमनी पब्लिशर्स ने 2009 में प्रकाशन किया।

02 अप्रैल 2023

खुदीराम बोस: वो क्रांतिकारी जो 18 की उम्र में हाथ में गीता लेकर फांसी पर चढ़ गया !

 खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर, 1889 को बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। इनके पिता त्रिलोकक्यनाथ बसु तहसीलदार थे। इनकी मां लक्ष्मीप्रिया देवी थी। बहुत कम उम्र में इन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया था। इनकी बड़ी बहन ने ही उनकी परवरिश की।

खुदीराम बोस


1905 में बंगाल का विभाजन होने के बाद खुदीराम बोस देश को आजादी दिलाने के लिए आंदोलन में कूद पड़े। सत्येन्द्र बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया।खुदीराम बोस स्कूल के दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने लग गए थे।

इन्होंने 9वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। स्कूल छोड़ने के बाद खुदीराम रिवोल्यूशनरी पार्टी मे शामिल हो गए ।

1906 में मिदनापुर में एक मेले का आयोजन किया गया। सत्येंद्रनाथ बोस ने वन्दे मातरम् शीर्षक से अंग्रेज़ी शासन के विरोध का पर्चा छपवाया। खुदीराम बोस को मेले में इन पर्चो को बांटने की जिम्मेदारी दी गयी ।

अंग्रेज़ों के पिट्ठू रामचरण सेन ने उनको शासन विरोधी पर्चा बांटते देख लिया, और इसकी सूचना एक सिपाही को दे दी। पुलिस के एक सिपाही ने खुदीराम को पकड़ने का प्रयास किया। खुदीराम ने उस सिपाही के मुंह पर एक घूंसा जड़ दिया। तभी वहां दूसरे पुलिस वाले पहुंच गए। उन सबने मिलकर खुदीराम बोस को पकड़ लिया।सिपाहियों की पकड़ थोड़ी ढ़ीली होते ही खुदीराम बोस वहां से ग़ायब हो गए।

8 अप्रैल, 1908 को 17 वर्षीय खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी को डगलस किंग्सफ़ोर्ड की हत्या का दायित्व सौंपा गया। इससे पहले क्रांतिकारियों ने किंग्सफ़ोर्ड को एक पार्सल बम भेजकर मारने की कोशिश की लेकिन वो बच गया ।

क्रांतिकारियों की इन गतिविधियों से डरकर किंग्सफ़ोर्ड ने अपना तबादला बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में करवा लिया।

 18 अप्रैल, 1908 को खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी मुज़फ़्फ़रपुर पहुंच गए। वहां दोनों एक धर्मशाला में ठहरे। दोनों युवाओं ने किंग्सफ़ोर्ड के आवास और उसकी दिनचर्या की निगरानी शुरू कर दी।

खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी को इस बात का अंदाज़ा हो गया कि किंग्सफ़ोर्ड हर रात विक्टोरिया बग्घी में अपनी पत्नी के साथ स्टेशन क्लब आते हैं।

 दोनों ने योजना बनाई कि क्लब से वापसी के समय किंग्सफोर्ड की बग्घी पर बम फेंककर उनकी हत्या कर दी जाए।

 30 अप्रैल, 1908 को किंग्सफ़ोर्ड अंग्रेज़ बैरिस्टर प्रिंगल कैनेडी की पत्नी और बेटी के साथ ब्रिज खेल रहे थे। शाम साढ़े आठ बजे जब खेल ख़त्म हुआ तो श्रीमती कैनेडी और ग्रेस कैनेडी घोड़े की बग्घी पर सवार हुईं, ये बग्घी किंग्सफ़ोर्ड की बग्घी से बहुत कुछ मिलती जुलती थी। 

जब बग्घी किंग्सफ़ोर्ड के घर के पूर्वी गेट पर पहुंची तो सड़क के दक्षिणी छोर पर छिपे हुए दो लोग उसकी तरफ़ दौड़े। उन्होंने बग्घी के अंदर बम फेंक दिया."जिस मे श्रीमती कैनेडी और ग्रेस कैनेडी की मौत हो गई ।

खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी वहां से भाग तो निकले लेकिन जल्दबाज़ी में खुदीराम के जूते वहीं रह गए। प्रशासन ने दोनों पर 5000 रुपए के ईनाम की घोषणा भी की ।

 खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी रेल पटरियों के किनारे भागते हुए समस्तीपुर के पास वैनी रेलवे स्टेशन पहुंच गए। वैनी स्टेशन के बाहर दोनों क्रांतिकारी एकदूसरे से गले मिलकर इस संकल्प के साथ अलग-अलग दिशाओं में चल पड़े कि अगर जीवन रहा तो कलकत्ता में फिर मिलेंगे।

1 मई, 1908 की सुबह वैनी रेलवे स्टेशन के पास खुदीराम पानी पीकर विश्राम के लिए बैठे ही थे कि उन्होंने सुना कि लोग आपस में रात की घटना की चर्चा कर रहे हैं। उसमें से किसी ने कहा, 'वो किंग्सफ़ोर्ड तो नहीं मरा इस बम से, लेकिन अंग्रेज़ मां-बेटी मारी गई।

"यह सुनकर खुदीराम को धक्का लगा। वहां पर अंग्रेज़ पुलिस के कुछ सिपाही और जासूस भी घूम रहे थे। खुदीराम की थकावट, उत्तेजना, उम्र के साथ-साथ उसका बांग्ला बोलने का लहज़ा और नंगे पांव होने के कारण संदेह में खुदीराम को फ़ौरन पकड़ लिया गया।

उधर प्रफ्फुल चाकी भी भाग-भाग कर भूक-प्यास से तड़प रहे थे। 1 मई को ही त्रिगुनाचरण नामक ब्रिटिश सरकार में कार्यरत एक आदमी ने उनकी मदद की और रात को ट्रेन में बैठाया पर रेल यात्रा के दौरान ब्रिटिश पुलिस में कार्यरत एक सब-इंस्पेक्टर को शक हो गया और उसने मुजफ्फरपुर पुलिस को इस बात की जानकारी दे दी। जब चाकी हावड़ा के लिए ट्रेन बदलने के लिए मोकामाघाट स्टेशन पर उतरे तब पुलिस पहले से ही वहां मौजूद थी। अंग्रेजों के हाथों मरने के बजाए चाकी ने खुद को गोली मार ली और शहीद हो गए।

खुदीराम बोस पर अपर सत्र न्यायाधीश एच डब्सू कॉर्नडफ़ की अदालत में हत्या का मुक़दमा चलाया गया। जब खुदीराम को अदालत में लाया जाता था तो सड़क के दोनों तरफ़ खड़े लोग ज़िन्दाबाद और वन्दे मातरम के नारों के साथ उनका स्वागत करते थे। 13 जून, 1908 को अदालत ने खुदीराम बोस को फांसी की सज़ा सुनाई।


जब खुदीराम शहीद हुए थे तब उनकी उम्र 18 साल 8 महीने और 8 दिन थी। 11 अगस्त 1908 को उन्हें मुजफ्फरपुर जेल में फांसी दे दी गई। जब खुदीराम शहीद हुए थे उसके बाद विद्यार्थियों और अन्य लोगों ने शोक मनाया। कई दिन तक स्कूल, कॉलेज सभी बन्द रहे और नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे, जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था।

 


रास बिहारी बोस को आखिर क्यों जाना पड़ा जापान #Rasbiharibose

रास बिहारी बोस भारत के प्रमुख क्रांतिकारी नेता थे. उनका ग़दर क्रांति और आजाद हिन्द फौज की स्थापना में भी योगदान था। रासबिहारी बोस का जन्म 2...