12 अक्टूबर 2023

रास बिहारी बोस को आखिर क्यों जाना पड़ा जापान #Rasbiharibose

रास बिहारी बोस भारत के प्रमुख क्रांतिकारी नेता थे. उनका ग़दर क्रांति और आजाद हिन्द फौज की स्थापना में भी योगदान था। रासबिहारी बोस का जन्म 25 मई 1886 को बंगाल में बर्धमान जिले के सुबालदह गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम विनोद बिहारी बोस और माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। 1889 में जब उनकी माताजी की मृत्यु हुई, उस समय वे बहुत छोटे बच्चे थे, अत: उनकी मौसी वामा सुंदरी ने उनका पालन पोषण किया रास बिहारी बोस की आरंभिक पढाई सुबालदाह में उनके दादाजी, कालीचरण की निगरानी में तथा आगे की शिक्षा डुप्लेक्स महाविद्यालय, चंदननगर में हुई। 1789 की फ्रेंच क्रांति ने रास बिहारी पर गहरा प्रभाव छोड़ा,प्रिंसिपल चारु चंद्र रॉय ने उन्हें क्रांतिकारी राजनीति में प्रेरित किया। बाद में ये कोलकाता के "मॉर्टन स्कूल" में भी पढे। क्रान्तिकारी गतिविधियों में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। प्रारम्भ में रासबिहारी बोस ने देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में कुछ समय तक हेड क्लर्क के रूप में काम किया।उनके द्वारा चलाये जा रहे क्रांतिकारी गतिविधियों का मुख्य केंद्र “वाराणसी” था यहाँ से उन्होंने सारे गुप्त क्रांतिकारी आंदोलनों का संचालन किया। इसी दौरान ये युगान्तर क्रान्तिकारी संगठन मे शामिल हो गये यही इनकी मुलाकात अमरेन्द्र चटर्जी से हुई। जार्ज पंचम के 12 दिसंबर 1911 को होने वाले दरबार के बाद जब वायसराय लॉर्ड हार्डिंग की दिल्ली में सवारी निकाली जा रही थी तो उसकी शोभायात्रा पर बम फेंकने की योजना बनाने में रासबिहारी की प्रमुख भूमिका रही थी। मास्टर अमीरचन्द, लाला हनुमन्त सहाय, मास्टर अवध बिहारी, भाई बालमुकुन्द और बसन्त कुमार विश्वास द्वारा लार्ड हार्डिंग नामक ब्रिटिश वायसराय को जान से मार डालने की एक क्रान्तिकारी योजना थी जो सफल न हो सकी। हालांकि बसंत ने जो बम फेंका वो वायसरॉय को न लगकर महावत को लग गया। हमले के तुरंत बाद बसंत ने एक बाथरूम में जाकर कपड़े बदल लिए. वह सुंदर लड़की से अब एक नौजवान लड़का बन चुका था. नीचे आकर दोनों भीड़ में मिल गए. वायसरॉय गंभीर रूप से घायल हो गए और उन्हें फेमस डॉक्टर एसी सेन के पास ले जाया गया हालांकि रास बिहारी पकड़े नहीं जा सके। रास बिहारी बोस रात की ट्रेन से देहरादून लौट आए और अगले दिन दफ्तर में ऐसे पहुंचे जैसे कुछ हुआ ही न हो... इसके अलावा, उन्होंने वायसरॉय पर हमले की निंदा करने के लिए देहरादून के नागरिकों की एक बैठक भी बुलाई. आखिर कौन कल्पना कर सकता है कि यह वही शख्स था जो इन सबका मास्टरमाइंड था। लार्ड हार्डिंग तो बच गया किन्तु जिस हाथी पर बैठाकर दिल्ली के चाँदनी चौक में वायसराय की शानदार शाही सवारी निकाली जा रही थी उसका महावत मारा गया। पुलिस ने इस काण्ड में चारो प्रमुख क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार करके उन पर वायसराय की हत्या की साजिश का मुकदमा चलाया। इस घटना को चांदनी चौक कांड और दिल्ली कांड के नाम से जाना गया इस घटना मे लालाजी को उम्रकैद की सजा देकर अण्डमान भेज दिया गया जबकि अन्य चारो को फाँसी की सजा हुई। चांदनी चौक कांड के बाद बोस और उनके साथियों पर लाहौर षड्यंत्र कांड का मुकदमा चलाया गया. सरकार के इस झूठे मुकदमे से बचने का एक ही रास्ता था, वो था देश छोड़कर भाग जाना. पुलिस की बढ़ी सख्ती को देखते हुए रास बिहारी बोस जून 1915 में राजा पी. एन. टैगोर के नाम से जापान पहुंचे और वहां रहकर देश की आजादी के लिए काम करने लगे। उन्होंने वहां अंग्रेजी अध्यापन के साथ-साथ लेखक व पत्रकार के रूप में भी काम किया और ‘न्यू एशिया’ नामक एक समाचार पत्र निकाला। रासबिहारी बोस ने वर्ष 1916 में जापान में रहते हुए सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको की बेटी ‘तोशिको सोमा’ से विवाह किया जिससे उन्हें एक बेटा और एक बेटी हुई। इसी की बदौलत वर्ष 1923 को रास बिहारी बोस को जापान की नागरिकता मिली। जून 1942 में उन्होंने बैंकाक में इंडियन इंडीपेंडेंस लीग का दूसरा सम्मेलन बुलाया, जिसमें सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और उसका अध्यक्ष बनने के लिए आमन्त्रित किया गया। मलाया और बर्मा के मोर्चे पर जापान ने कई भारतीय युद्धबन्दियों को पकड़ा था। इन युद्धबन्दियों को इण्डियन इण्डिपेण्डेंस लीग में शामिल होने और इंडियन नेशनल आर्मी (आई०एन०ए०) का सैनिक बनने के लिये प्रोत्साहित किया गया। आई०एन०ए० इण्डियन नेशनल लीग की सैन्य शाखा के रूप में सितम्बर 1942 में गठित की गयी। इसके बाद जापानी सैन्य कमान ने रास बिहारी बोस और जनरल मोहन सिंह को आई०एन०ए० के नेतृत्व से हटा दिया लेकिन आई०एन०ए० का संगठनात्मक ढाँचा बना रहा। बाद में सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नाम से आई०एन०ए० का पुनर्गठन किया। भारत को अंग्रेजी हुकुमत से मुक्ति दिलाने का सपना लिए भारत माता का यह वीर सपूत 21 जनवरी 1945 को परलोक सिधार गया। उनकी मृत्यु से पहले, जापानी सरकार ने उन्हें ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन (द्वितीय श्रेणी) से सम्मानित किया था। 26 दिसंबर, 1967 को, डाक और तार विभाग ने राश बिहारी बोस के सम्मान में एक विशेष डाक टिकट जारी किया।

07 अक्टूबर 2023

Kalpana Dutta : लड़का बनकर अंग्रेजों से लोहा लेने वाली नायिका की कहानी

इस देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए हर वर्ग और समुदाय के लोगों ने कुर्बानी दी. पुरुषों के साथ महिलाओं ने भी बड़ी तादाद में ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौति दी, लेकिन उनमें कई ऐसे गुमनाम आजादी के सिपाही हैं जिनकी शायद ही कोई चर्चा होती है. उन्हीं में से एक नाम है ‘वीर महिला’ का ख़िताब पाने वाली कल्पना दत्त का, जिन्होंने भारत की आजादी में भेष बदलकर अंग्रेजों का मुकाबला किया। कल्पना दत्ता का जन्म 27 जुलाई 1913 को बंगाल प्रांत में चटगांव जिले के गांव श्रीपुर में हुआ था। इनके पिता बिनोद बिहारी दत्त एक सरकारी कर्मचारी थे। कल्पना ने चटगांव से अपनी मैट्रिक की परीक्षा पास की और 1929 मे कलकत्ता चली गईं और विज्ञान की पढाई करने के लिए बेथ्यून कॉलेज में admission ले लिया । यहाँ उन्होंने बीएससी में दाखिला लिया और क्रांतिकारियों की कहानियाँ पढने लगी। इन कहानियों ने उन पर गहरा प्रभाव डाला। वह महिला छात्र संघ से जुड़ गई जो एक अर्ध-क्रांतिकारी संगठन था जिसमें बीना दास और प्रीतिलता वाडेदार भी सक्रिय सदस्य थीं और खुद भी क्रांतिकारी कामों में रूचि लेने लगी। Kalpana Datta प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्यसेन की इंडियन रिपब्लिकन आर्मी से जुड़ी। सूर्यसेन को मास्टर दा के नाम से भी जाना जाता हैं। उनके संगठन ‘इन्डियन रिपब्लिकन आर्मी’ से जुड़कर इन्होंने अंग्रेजो की खिलाफ मोर्चा खोल दिया।1930 में इस दल ने चटगांव शास्त्रागार लूटा अंग्रेज़ो की नजर में आने पर कल्पना को पढ़ाई छोड़कर चटगांव आना पड़ा। और यहीँ से इस दल के संपर्क में रही। उनके साथ के कई क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिए गए। Kalpana Datta वेष बदलकर कलकत्ता से विस्फोटक सामग्री ले जाने लगीं और संगठन के लोगो को विस्फोटक सामग्री और हथियार पहुंचाने लगी। इन्होंने अपने साथियों को आजाद कराने का प्लान बनाया जिसके तहत जेल की दीवार को बम से उड़ाने की योजना बनाई गयी थी , लेकिन पुलिस को योजना का पता चल गया। वह वेष बदलकर घुमती फिर रही थी, लेकिन पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया, हालांकि अभियोग सिद्ध ना होने पर उन्हें छोड़ दिया गया, पुलिस ने उनके घर पर पहरा लगा दिया, लेकिन वह आंखों में धुल झोंककर भाग गई। सूर्यसेन को पुलिस ने गिरफ्तार लिया और 1933 में कल्पना भी गिरफ्तार हो गई। क्रांतिकारियों पर मुकदमा चला और 1934 में सूर्यसेन को फांसी और कल्पना दत्त को आजीवन कारावास की सजा हो गई। 1937 में जब पहली बार प्रदेशों में भारतीय मंत्रिमंडल बने, तब महात्मा गांधी , रवीन्द्र नाथ टैगोर आदि के विशेष प्रयत्नों से 1939 में कल्पना जेल से रिहा हो गईं। जेल से रिहा होने के बाद इन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की कल्पना दत्ता ने 1940 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और इसके बाद राजनीति में कदम रखा. और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गईं. जेल में रहते हुए उनकी कई कम्युनिस्ट नेताओं से मुलाकात हुई थी. उन्होंने मार्क्सवादी विचारों को भी पढ़ा था. वो उनके विचारों से काफी प्रभावित हुई . कल्पना दत्ता ने 1943 भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पूरन चंद जोशी के साथ शादी कर ली और वह कल्पना दत्ता से कल्पना जोशी बन गईं।। उनके दो बेटे थे: चाँद और सूरज उन्होंने बंगाल अकाल और बंगाल विभाजन के दौरान एक राहत कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया आगे 1943 में ही बंगाल के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने कल्पना को अपना उम्मीदवार बनाया. लेकिन वो चुनाव जीतने में असफल रहीं। आगे कुछ मतभेदों के चलते इन्होंने अपने पति से अलग रहने का फैसला किया और बंगाल से दिल्ली आ गईं और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से इस्तीफ़ा देकर राजनीति से खुद को अलग कर लिया. बाद मे कल्पना ने चटगांव लूट पर आधारित बंगाली में अपनी आत्मकथा भी लिखी। जिसका अंग्रेजी में अनुवाद अरुण बोस और निखिल चक्रवर्ती ने किया था। कल्पना दत्ता ने 8 फरवरी 1995 में इस दुनिया से अलविदा कह दिया. देश ने एक जांबाज महिला को खो दिया था कल्पना पर एक किताब ‘डू एंड डाई:चटगाम विद्रोह; लिखी गई। साल 1979 में कल्पना दत्त की बहादुरी और आजादी में दिए गए योगदान को देखते हुए पुणे में ‘वीर महिला’ के ख़िताब से सम्मानित किया गया। 2010 में, हिंदी फिल्म 'खेलें हम जी जान से' में दीपिका पादुकोण ने कल्पना दत्ता की भूमिका निभाई और अभिषेक बच्चन ने सूर्य सेन की,जो चटगांव शस्त्रागार छापे और उसके परिणामों पर आधारित थी।

23 सितंबर 2023

Kamladevi Chattopadhyay Biography Hindi कमलादेवी चट्टोपाध्याय की जीवनी

स्वतंत्रता संघर्ष के ऐतिहासिक युग की जब भी बात होती है तो कुछ गिने-चुने ही क्रांतिकारी और समाज सुधारकों की चर्चा होती है ऐसा ही एक नाम है समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी, और भारतीय हस्तकला के क्षेत्र में नई रोशनी की किरण लाने वाली ‘कमलादेवी चट्टोपाध्याय’ का। इन्होंने हस्तकला को पुनर्जीवित किया, आज़ादी की मांग की, नमक आंदोलन और असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। इतना ही नहीं इन्होंने राजनीति में आने और चुनाव लड़ने तक का साहस जुटाया। कमलादेवी चट्टोपाध्याय का जन्म 3 अप्रैल 1903 को कर्नाटक के मैंगलोर शहर में हुआ था। इनके पिता का नाम अनंत धारेश्वर था जो उस समय मैंगलोर के जिला कलेक्टर थे और मा का नाम गिरिजा देवी था अपने तीनभाई बहनो मे ये सबसे छोटी थी। कर्नाटक से ही इन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा पूरी की थी। जिसके बाद इन्होंने चेन्नई के क्यून मैरी कॉलेज में admission ले लिया था और यहां से अपनी आगे की शिक्षा जारी रखी। इनकी शादी महज़ 14 साल की उम्र में कृष्णा राव से हुई थी शादी के दो साल बाद ही इनके पति का निधन हो गया। कमलादेवी जब 20 साल की थी तब इनका दूसरा विवाह सरोजनी नायडू के भाई हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय के साथ हुआ जो एक कवि होने के साथ-साथ नाटककार भी थे इनके बेटे का नाम रामकृष्ण चट्टोपाध्याय था। शादी के कुछ साल बाद ही कमलादेवी अपने पति के साथ लंदन चली गई लंदन में रहते हुए इन्होंने जिमलोम बेडफ़ोर्ड कॉलेज से समाजशास्त्र से डिप्लोमा किया। कमलादेवी की ये शादी महज 32 साल तक ही चल सकी और इन्होंने अपने पति से अलग होने का फैसला किया। वर्ष 1920 के दशक में खुले राजनीतिक चुनाव में खड़े होने का साहस जुटाया था, वह भी ऐसे समय में जब बहुसंख्यक भारतीय महिलाओं को आजादी शब्द का अर्थ भी नहीं मालूम था। भारत आने के बाद इन्होंने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया आंदोलन में भाग लेने के साथ-साथ, सेवा दल नामक एक संगठन में भी हिस्सा लिया था. ये संगठन सामाजिक उन्नति के लिए कार्य करता था। साल 1926 तक कमलादेवी ने देश में हो रहे कई आंदोलनों में भाग लिया था और इसी दौरान इनको मद्रास प्रांतीय विधान सभा का कार्य संभालने का मौका मिला था, जिसके साथ ही ये हमारे देश की पहली ऐसी महिला बन गई थी, जिन्होंने विधान सभा का कार्यालय चलाया था। गाँधी जी के ‘नमक आंदोलन’ और ‘असहयोग आंदोलन’ में हिस्सा लेने वाली महिलाओं में से एक थीं। नमक कानून तोड़ने के मामले में बांबे प्रेसीडेंसी में गिरफ्तार होने वाली ये पहली महिला थीं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ये चार बार जेल गईं और पांच साल तक सलाखों के पीछे रहीं। महिलाओं का स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश का श्रेय कमलादेवी को ही जाता है।इन्होने ‘ऑल इंडिया वीमेन्स कांफ्रेंस’ की स्थापना की। भारत में आज अनेक प्रमुख सांस्कृतिक संस्थान इनकी दूरदृष्टि और पक्के इरादे के परिणाम हैं. जिनमें प्रमुख हैं- नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, संगीत नाटक अकेडमी, सेन्ट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज एम्पोरियम और क्राफ्ट कौंसिल ऑफ इंडिया। इन्होंने हस्तशिल्प और को-ओपरेटिव आंदोलनों को बढ़ावा देकर भारतीय जनता को सामाजिक और आर्थिक रूप से विकसित करने में अपना योगदान दिया। हालांकि इन कार्यों को करते समय इन्हें आजादी से पहले और बाद में सरकार से भी संघर्ष करना पड़ा। भारत की आजादी के लिए कमलादेवी ने एक बार विश्व दौरा भी किया था और अपने इस दौरे के दौरान इन्होंने भारत के हालातों को दुनिया के देशो के सामने रखा था ताकि देश की आजादी के लिए अंग्रेजो पर दवाब बनाया जा सके। जब भारत को आजादी मिली , तो उस वक्त पाकिस्तान से बहुत सारे लोग भारत आए थे। इन लोगों के पास ना तो घर था, ना खाने के लिए खाना. ऐसी स्थिति में इन लोगों की मदद कमलादेवी जी ने की थी और इन्होंने उस समय इन लोगों के रहने के लिए फरीदाबाद शहर बसाया था। इस शहर में करीब 50 हजार से अधिक शरणार्थियों का पुनर्वास किया गया था। कमला देवी ने अपनी अंतिम सांस महाराष्ट्र के मुंबई में 29 अक्टूबर 1988 ली थी जिस वक्त इनकी मृत्यु हुई थी उस वक्त इनकी आयु 85 वर्ष थी। कमला चट्टोपाध्याय पहली भारतीय महिला थीं, जिन्होंने हथकरघा और हस्तशिल्प को न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। आजादी के बाद इन्हें वर्ष 1952 में ‘आल इंडिया हेंडीक्राफ्ट’ का प्रमुख नियुक्त किया गया। कमलादेवी चट्टोपाध्याय को लिखने का भी शोंक था और उन्होंने कई पुस्तकें लिखी जो लोगो में काफी चर्चित हुयीं। जैसे द अवेकिंग ऑफ इंडियन वोमेन जापान इट्स विकनेस एंड स्ट्रेन्थ अंकल सैम एम्पायर ‘इन वार-टॉर्न चाइना टुवर्ड्स ए नेशनल थिएटर’ इतना ही नहीं कमलादेवी ने एक अभिनेत्री के रूप में भी काम किया। इनकी दो मूक फिल्में भी की । साल 1931 में ‘मृच्छाकटिका’और साल 1943 में तानसेन फिल्म ‘शंकर पार्वती’ और ‘ धन्ना भगतट में भी इन्होंने महत्वपूर्ण किरदार निभाया था। समाज सेवा के लिए भारत सरकार ने इन्हें 1955 में नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया। सामुदायिक नेतृत्व के लिए वर्ष 1966 में इन्हें ‘रेमन मैग्सेसे’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इन्हें संगीत नाटक अकादमी द्वारा ‘फेलोशिप और रत्न सदस्य’ से सम्मानित किया गया। संगीत नाटक अकादमी के द्वारा ही वर्ष 1974 में इन्हें ‘लाइफटाइम अचिवेमेंट’ पुरस्कार भी प्रदान किया गया था। यूनेस्को ने इन्हें वर्ष 1977 में हेंडीक्राफ्ट को बढ़ावा देने के लिए सम्मानित किया था। शान्ति निकेतन ने अपने सर्वोच्च सम्मान ‘देसिकोट्टम’ से सम्मानित किया। 1987 में भारत सरकार ने दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से इन्हें सम्मानित किया। मार्च 2017 में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला बुनकरों एवं शिल्पियों के लिए ‘कमलादेवी चट्टोपाध्याय राष्ट्रीय पुरस्कार’ शुरू करने की घोषणा की गयी। इनके 115 जन्म दिवस के दिन यानी 3 अप्रैल को इन्हें याद करते हुए गूगल ने अपने होमपेज को इनके नाम किया और डूडल में इनकी तस्वीर के साथ संगीत और हस्तकला को दिखाया . इस तस्वीर के जरिए डूडल ने कमलादेवी के उन योगदानो की झलक दिखाने की कोशिश की जो इन्होंने हमारे देश को दिए हैं।

29 जुलाई 2023

Biography of Bhikaiji Cama।विदेश में फहराया भारत का झंडा

श्रीमती भीखाजी जी कामा भारतीय मूल की फ्रांसीसी नागरिक थीं जिन्होने लन्दन, जर्मनी तथा अमेरिका मे भारत की स्वतंत्रता के लिए लोगो को जागरूक किया।
इन्हें 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टटगार्ट नगर में हुई सातवीं अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस की सभा में पहली बार भारत का राष्ट्रध्वज फहराने के लिए जाना जाता हैं। उस समय तिरंगा वैसा नहीं था जैसा आज है। उस झंडे में देश के विभिन्न धर्मों की भावनाओं और संस्कृति को समेटने की कोशिश की गई थी। उसमें इस्लाम, हिंदुत्व और बौद्ध मत को प्रदर्शित करने के लिए हरा, पीला और लाल रंग इस्तेमाल किया गया था। साथ ही उसमें बीच में देवनागरी लिपि में ̔वंदे मातरम् लिखा हुआ था । राष्ट्रध्वज फहराने के बाद इन्होंने लोगों से अपील की और कहा "इस झंडे के नाम पर मैं दुनिया भर के स्वतंत्रता प्रेमियों से इस संघर्ष का समर्थन करने की अपील करती हूं यह स्वतंत्र भारत का झंडा है। मैं सभी सज्जनों से अपील करती हूं कि वह खड़े होकर राष्ट्रध्वज को सलामी दें।” बाद में इस ध्वज को भारत सरकार द्वारा आम जनता के लिए एक ऐतिहासिक स्मृति के रूप में पुणे में मराठा और केसरी पुस्तकालय में प्रदर्शित किया गया था। भीकाजी कामा का जन्म 24 सितम्बर 1861 को बम्बई में एक पारसी परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम सोराबजी पटेल था। भीखाजी के नौ भाई-बहन थे। इनका विवाह 1885 में एक पारसी समाज सुधारक रुस्तम जी कामा से हुआ था। भीकाजी कामा को मैडम कामा तथा मैडम भीकाजी रुस्तम कामा के नाम से जाना जाता है। आजादी की लड़ाई में उनके योगदान के लिए उन्हें देश की बेटी और मदर आफ इंडियन रिवॉल्यूशन के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने अपनी शिक्षा एलेक्जेंड्रा नेटिव गल्र्स संस्थान में पूरी की थी। बॉम्बे शहर मे सितंबर 1896 में प्लेग फैलने लगा जिसके बाद ब्रिटिश सरकार ने बॉम्बे को प्लेग संक्रमित शहर घोषित किया। भीकाजी कामा ने प्लेग प्रभावित रोगियों की देखभाल और सेवा की। रोगियों की देखभाल के दौरान वह भी बीमारी की चपेट मे आ गयीं जिसके बाद वह अपने इलाज के लिए डॉक्टरों की सलाह पर यूरोप चली गई। 1902 मे छह साल बाद भिकाजी कामा ने लंदन में रहने का फैसला किया। भीकाजी कामा लंदन में दादाभाई नौरोजी के संपर्क में आईं। जो इंग्लैंड में भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ब्रिटिश समिति के नेता थे। दादाभाई नौरोजी के देशभक्ति के विचारों से प्रभावित होकर भीकाजी कामा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गई और दादाभाई नौरोजी के सहायक के रूप में काम करने लगी। इंग्लैंड में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ब्रिटिश समिति में शामिल होने के तुरंत बाद उन्होंने लाला हरदयाल और श्यामजी कृष्ण वर्मा के साथ लंदन के हाइड पार्क में लोगो को संबोधित करना शुरू किया श्यामजी कृष्ण वर्मा ने फरवरी 1905 में इंडियन होम रूल सोसाइटी नामक एक संगठन की स्थापना की, जिसमें भिकाजी कामा शामिल हुई। कुछ साल बाद भीकाजी कामा, दादाभाई नौरोजी और सिंह रेवाभाई राणा को ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के कारण लंदन छोड़ने का नोटिस थमा दिया। पुलिस ने उन्हें ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों में शामिल न होने की शर्त पर लंदन में रहने का एक और मौका दिया। लेकिन इन्होंने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और पेरिस चली गई। फ्रांस में उन्होंने अन्य भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों जैसे एस आर राणा और मुंचेरशाह बुर्जोरजी के साथ पेरिस इंडियन सोसाइटी की स्थापना की। विदेशी धरती पर भारतीय स्वतंत्रता के लिए आंदोलन के कारण फ्रांसीसी पुलिस ने कामा को आत्मसमर्पण करने के लिए नोटिस जारी किया कामा फ्रांसीसी सरकार की शर्तों से सहमत नहीं थी। अंग्रेजों ने फ्रांस सरकार के सहयोग से इंग्लैंड में भिकाजी कामा की सारी संपत्तियां जब्त कर ली। जल्द ही फ्रांस सरकार ने भी उन्हें फ्रांस छोड़ने का आदेश दिया। उसी समय एक रूसी क्रांतिकारी और राजनीतिज्ञ व्लादिमीर लेनिन ने भिकाजी कामा को सोवियत संघ में आमंत्रित किया, जिसे इन्होंने अस्वीकार कर दिया। वर्ष 1920 में भीकाजी कामा हेराबाई और मिथन टाटा नाम की दो पारसी महिलाओं से मिली जो महिलाओं को वोट देने के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहीं थीं इन महिलाओं से मिलने के बाद भिकाजी ने टिप्पणी की-"भारत की आजादी के लिए काम करें। जब भारत स्वतंत्र होगा तो महिलाओं को न केवल वोट देने का अधिकार होगा, बल्कि अन्य सभी अधिकार होंगे” भीकाजी कामा यूरोप में रहने के दौरान paralysis की चपेट मे आ गयी । 24 जून 1935 को उन्होंने सर कोवासजी जहांगीर के माध्यम से ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखा कि मैं पेरिस छोड़ कर जा रही हूँ और आंदोलनकारियों से अनुरोध किया की वह वापस भारत चले जाए। एक साल बाद लंबी बीमारी के कारण बॉम्बे के पारसी अस्पताल में 13 अगस्त 1936 में उनकी मृत्यु हो गई। भिकाजी कामा की मृत्यु के बाद उनका निजी सामान और संपत्ति बॉम्बे में लड़कियों के लिए अवाबाई पेटिट अनाथालय नामक एक ट्रस्ट को सौंप दिया गया था। बाद में इस अनाथालय का नाम बदलकर बाई अवाबाई फ्रामजी पेटिट गर्ल्स हाई स्कूल, मुंबई कर दिया गया। भारत की स्वतन्त्रता के संघर्ष में उनके बलिदान और सम्मान के लिए बॉम्बे की विभिन्न सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया। भारत के 11वें गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 1962 को भारतीय डाक एवं तार विभाग ने उनके नाम पर 15 पैसे का डाक टिकट जारी किया था। वर्ष 1977 में भारतीय तटरक्षक आयोग ने ‘प्रियदर्शिनी-श्रेणी के तेज गश्ती पोत ICGS भिकाईजी कामा’ नामक एक जहाज का नामकरण किया। दक्षिण दिल्ली में भिकाजी कामा के नाम पर एक आधिकारिक इमारत का निर्माण किया गया जो , जिंदल समूह, सेल, गेल और EIEL जैसे कार्यालयों के लिए प्रदान की गई थी। वर्ष 2016 में एक भारतीय लेखक भोला यामिनी द्वारा ‘द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ मैडम भिकाजी कामा’ शीर्षक से एक पुस्तक प्रकाशित की गई थी।

21 जुलाई 2023

मराठा साम्राज्य के महान पेशवा बालाजी विश्वनाथ की कहानी

बालाजी विश्वनाथ मराठा साम्राज्य के पहले पेशवा थे जब मराठा साम्राज्य शिवाजी की मृत्यु के बाद कमजोर पड़ गया था इन्होने उस समय पेशवाई की नीव रखकर मराठा साम्राज्य को नई शक्ति दी | छत्रपति साहू के शाषनकाल में इन्होंने गृह युद्दो को जीतकर मुगलों को अनेक बार परास्त किया ,इसी वजह से इन्हें “मराठा साम्राज्य का द्वितीय संस्थापक ” भी माना जाता है | उनके बाद उनके पुत्र पेशवा बाजीराव ने मराठा साम्राज्य को आधे भारत में फैला दिया था |
बालाजी विश्वनाथ का जन्म 1 जनवरी 1662 को महाराष्ट्र के वर्तमान रायगढ़ जिले के श्रीवर्धन में हुआ था।इनके पिता का नाम विश्वनाथपंत भट्ट था। बालाजी विश्वनाथ की पत्नी का नाम राधा बाई था। इनके दो पुत्र एवं दो कन्याएँ थीं। बाजीराव जो उनके पश्चात पेशवा बने और पुत्री का नाम भयू बाई और अनु बाई था। 1712 ई. के मध्य बालाजी विश्वनाथ ने पूना और दौलताबाद के सूबेदार के रुप मे कार्य किया । इधर धनाजी जादव की मृत्यु के बाद उसके पुत्र चन्द्रसेन जादव को छत्रपति शाहू ने सेनापति बनाया। परन्तु चन्द्रसेन जादव का ताराबाई के प्रति झुकाव देखकर, उसे सेनापति के पद से हटा दिया, और बालाजी विश्वनाथ को सेनापति बनाया । सेनापति का पद छिन जाने से चन्द्रसेन क्रोधित था, और इसे अपना अपमान समझता था। इस फूट का फायदा उठाकर ताराबाई ने चन्द्रसेन एवं कान्होजी आंगड़े के साथ मिलकर छत्रपति शाहू एवं उनके पेशवा बहिरोपन्त पिंगले को कैद कर लिया। बालाजी विश्वनाथ ने सफल कूटनीति के द्वारा छत्रपति शाहू एवं उनके पेशवा बहिरोपन्त पिंगले को ताराबाई की कैद से आजाद कराया जिस से खुश होकर छत्रपति शाहू ने 1713 ई. में बालाजी को अपना पेशवा बनाया। इतिहास मे थोड़ा पीछे चलने पर पता चलता है कि:- छत्रपति शिवाजी की मृत्यु के बाद उनके दो पुत्र सम्भाजी और राजाराम मुगल साम्राज्य के खिलाफ लडते रहे | औरंगजेब ने 1686 में दक्कन में प्रवेश किया ताकि वो अनुभवहीन मराठा साम्राज्य का पतन कर सके इसलिए अगले 21 वर्षो तक औरंगजेब लगातार दक्कन में मराठो के खिलाफ़ युद्ध करता रहा | क्षत्रपति सम्भाजी और उनके भाई राजाराम की मौत के बाद राजाराम की पत्नी ताराबाई ने मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली क्योंकि उस वक्त सम्भाजी के पुत्र साहू को मुगलों ने बहुत छोटी उम्र मे ही बंदी बना लिया था। 88 वर्ष की उम्र में जब औरंगजेब मरा तो उसकी मौत के साथ ही मुगल सेना भी बिखर गयी और मुगल साम्राज्य पर राजकुमार मुअज्जम को बहादुर शाह नाम के साथ मुगल सिंहासन पर बिठाया गया। इसी के साथ औरंगजेब की मौत के बाद दक्कन के मुगल सेनापति ने साहू को अपनी कैद से मुक्त कर दिया ताकि मराठो में सत्ता के लिए आपसी संघर्ष शुरू हो जाए और हुआ भी यही क्षत्रपति साहू और ताराबाई के बीच सत्ता के लिए संघर्ष शुरू हो गया | ताराबाई ने मराठा सेनापति धनाजी जाधव को शाहू पर आक्रमण करने का आदेश दिया। धनाजी जाधव और क्षत्रपति शाहू की सेना का पुणे में आमना सामना हुआ। लेकिन धनाजी जाधव ने क्षत्रपति शाहू पर आक्रमण करने के बजाय ने उन्हें मराठा साम्राज्य का सही उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। यह सब बालाजी विश्वनाथ की कूटनीति के कारण सम्भव हो पाया। 1708 में छत्रपति शाहू का जब राजतिलक हुआ तब शाहू ने बालाजी विश्वनाथ को मुतालिक बनाया और मराठा दरबार में जगह दी। कोल्हापुर में बालाजी और ताराबाई की सेना के बीच युद्ध हुआ जिसमें बालाजी ने ताराबाई की सेना को हरा दिया , अब बालाजी ने राजाराम की दुसरी पत्नी राजसबाई को उनके पुत्र सम्भाजी द्वितीय को कोल्हापुर के सिंहासन पर बिठाने के लिए उकसाया ताकि ताराबाई के पुत्र शिवाजी द्वितीय को सत्ता से हटाया जा सके। इसके साथ ही कोल्हापुर भी शाहू के नेतृत्व में आ गया। इसके बाद छत्रपति शाहू ने बालाजी की नेतृत्व शक्ति को देखते हुए हुए पेशवा नियुक्त किया , जो वर्तमान में प्रधानमंत्री की तरह होता है। सिंहासन पर छत्रपति शाहू ही बैठते थे लेकिन युद्ध के लिए बालाजी अपनी सेना के साथ जाते थे। बालाजी विश्वनाथ के प्रयासों और पुरुषार्थ से मराठा साम्राज्य अपने उसी गौरवपूर्ण पद को प्राप्त करने में सफल हुआ ,जैसा शिवाजी महाराज के समय प्रतिष्ठित था । उनकी इन सेवाओं का पुरस्कार देते हुए छत्रपति साहू ने उन्हें पेशवा के पद पर बिठाया था । छत्रपति शाहू ने अब पेशवा का पद वंशानुगत कर दिया था। पेशवा पद के वंशानुगत हो जाने के कारण ही बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद उनके पुत्र बाजीराव प्रथम को पेशवा का पद दिया गया। 12 अप्रैल 1720 को मराठा साम्राज्य के इस महान नक्षत्र का देहांत हो गया। इन्होने अपने जीवन में मराठा साम्राज्य के शीर्ष पद को सुशोभित किया । बालाजी विश्वनाथ को 1713 में पेशवा की उपाधि दी गई थी। पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने 1719 में सैय्यद बंधुओं के कहने पर मुगल सम्राट से जो संधि की थी उसमें पेशवा ने अपना पूर्ण राजनीतिक और कूटनीतिक कौशल दिखाया था। जिसके माध्यम से उन्होंने मुगलों की राजनीति में हस्तक्षेप करने का अधिकार मराठों के लिए प्राप्त कर लिया था। वास्तव में यह उनकी बहुत बड़ी कूटनीतिक सफलता थी। तभी तो इस सन्धि को सर रिचर्ड टेम्पल ने मराठा साम्राज्य का मैग्नाकार्टा कहा है।

15 जुलाई 2023

वीर कुंवर सिंह का इतिहास और शौर्यगाथा

कुंवर सिंह का जन्म एक राजपूत परिवार मे हुआ था। इनको 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महानायक के रूप मे भी जाना जाता है
वीर कुंवर सिंह का जन्म 13 नवम्बर 1777 को बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर नामक गांव में हुआ था। इनका परिवार एक क्षत्रिय जमीनदार परिवार था। इनके पिता का नाम बाबू साहबजादा सिंह और माता का नाम पंचरतन कुंवर था। कुंवर सिंह प्रसिद्ध परमार राजपूत शासक राजा भोज के वंशजों में से थे। इसी वंश में महान चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने भी जन्म लिया था। 80 साल की उम्र में कुंवर सिंह ने अंग्रेजों का सामना किया और हाथ में गोली लगने के बाद अपना हाथ खुद ही काट लिया था। इनके छोटे भाई अमर सिंह और दयालु सिंह थे।बचपन से ही इनको खेलने की बजाय घुड़सवारी, निशानेबाज़ी, तलवारबाज़ी सीखने का शौक था। वीर कुंवर सिंह मुजरा देखने के शौकीन थे ।इतिहास की मानें तो कहा जाता है कि कुंवर सिंह धरमन बाई का मुजरा देखने जाया करते थे और यही पर धरमन बाई और कुंवर एक दूसरे से प्यार करने लगे और अंत में इन्होंने शादी भी कर ली । धरमन बाई और करमन बाई दो बहने हुआ करती थी । जो बिहार के शहर जगदीशपुर के एक नुक्कड़ पर मुजरे का कार्यक्रम किया करती थी । उन्होंने करमन बाई के नाम पर एक टोला बसा डाला । जो कि आज भी बिहार के जगदीशपुर में स्थित है । वह धरमन बाई से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने धरमन चौक का निर्माण करवा दिया। कुंवर सिंह, ने ब्रिटिश औपनिवेशिक ताकतों के खिलाफ कई लड़ाइया लडी। इनके द्वारा लड़ी गई शुरुआती लड़ाइयों में से एक जगदीशपुर की लड़ाई थी,जो मई 1857 में हुई थी। कुंवर सिंह, उस समय 80 वर्ष के थे, इन्होने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने के लिए सशस्त्र किसानों के एक समूह का नेतृत्व किया। विद्रोहियो की इस भीड ने जगदीशपुर में ब्रिटिश चौकी पर हमला किया और उनके हथियार और गोला-बारूद जब्त कर लिए। जगदीशपुर की लड़ाई के बाद, कुंवर सिंह ने बिहार के आरा की ओर कूच किया, यहा अंग्रेजों ने 50 सैनिकों की एक छोटी चौकी स्थापित की थी, कुंवर सिंह और उनके सैनिकों ने कई हफ्तों तक इस चौकी की घेराबंदी की। बिहार के छपरा मे अंग्रेजों ने लगभग 200 सैनिकों की एक चौकी तैनात की थी, जिसकी कमान कैप्टन ले ग्रैंड के पास थी। कुंवर सिंह और उनके सैनिकों ने ब्रिटिश सेना के साथ भीषण युद्ध किया। कम संख्या में होने के बावजूद, विद्रोहियों ने अंग्रेजों को भारी नुकसान पहुंचाया और उन्हें शहर से पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। मीरानपुर कटरा में मेजर विंसेंट आइरे की कमान में एक ब्रिटिश सेना द्वारा उन्हें रोक दिया गया था। विद्रोहियों ने अंग्रेजों के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी, लेकिन अंततः उनके पास तोपखाने और आधुनिक हथियारों की कमी के कारण हार गए। कुंवर सिंह युद्ध में घायल हो गए और उन्हें अपने गृहनगर जगदीशपुर वापस जाना पड़ा। मीरानपुर कटरा की लड़ाई के बाद, वीर कुंवर सिंह ने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई, जिसमें ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा युद्ध नीति तथा रणनीति में माहिर कुवर सिंह अंग्रेजों के कट्टर दुश्मन बन चुके थे । ब्रिटिश शासन के एक सिपाही डगलस ने कुंवर सिंह को पकड़ने की योजना बनाई डग्लस को सूचना मिली कि कुंवर सिंह अपने कुछ साथियों के साथ गंगा नदी को पार कर रहे हैं । डग्लस अपनी सेना लेकर गंगा नदी के पास पहुंच गया ।जिस नाव पर कुंवर सिंह तथा उनके कुछ साथी सवार थे डगलस ने उस पर अंधाधुंध फायरिंग करवा दी । जिसमे एक गोली कुंवर सिंह की बांह पर जा लगी । गोली लगने के बाद कुंवर सिंह अपने महल लौट आए । जहां वे महज 3 दिन ही बिता सकें। उसके पश्चात 26 अप्रैल 1858 में वीर कुंवर सिंह का देहांत हो गया। वीर कुंवर सिंह ने ब्रिटिश सेना के खिलाफ लड़ाइयों करके 1857 के भारतीय विद्रोह में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। एक बुजुर्ग व्यक्ति होने के बावजूद, उन्होंने आजादी की लड़ाई में अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प का प्रदर्शन किया। ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने कुंवर सिंह के विषय में लिखा “उस 80 साल के बूढ़े ने ब्रिटिश सरकार की नीव हिला के रख दी थी । यदि वह जवानी के दिनों में होता तो यकीनन 1857 से पहले ही भारत को ब्रिटिश सरकार से आजादी मिल जाती” बिहार के जगदीशपुर में बीच सड़क पर एक चौक पर वीर कुंवर सिंह की विशाल मूर्ति उनकी उपलब्धि में शामिल है । भारत के इस महान स्वतंत्रता सेनानी के ऊपर कई प्रसिद्ध पुस्तकों लिखी गयी है जैसे। “बायोग्राफी ऑफ कुंवर सिंह एवं अमर सिंह” “वीर कुंवर सिंह द ग्रेट वारियर ऑफ 1857” भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान का सम्मान करने के लिए, भारतीय सरकार ने 23 अप्रैल 1966 को एक डाक टिकट जारी किया। बिहार सरकार ने 1992 में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, अर्रा की स्थापना की 2017 में, वीर कुंवर सिंह सेतु, जिसे अर्राह-छपरा पुल भी कहा जाता है, का उद्घाटन उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने के लिए किया गया था। 2018 में, कुंवर सिंह की मृत्यु की 160 वीं वर्षगांठ मनाने के लिए, बिहार सरकार ने हार्डिंग पार्क में उनकी एक प्रतिमा का पदार्पण किया। पार्क को आधिकारिक तौर पर "वीर कुंवर सिंह आजादी पार्क" के रूप में भी नामित किया गया था।

05 जुलाई 2023

गंगाधर राव नेवालकर का जीवन परिचय

गंगाधर राव का जन्म 1814 मे हुआ था इनके पिता का नाम शिव राव भाऊ नेवालकर और माता का नाम पद्मा बाई था। गंगाधर राव नेवालकर उत्तर भारत में स्थित झाँसी के 5वें राजा थे, जो की झाँसी के पहले शासक रघुनाथ हरी नेवलकर के वंशज थे।
गंगाधर राव के पूर्वज महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले से आये थे पेशवाओ के शासन काल में इनमे से कुछ खानदेश चले गए और वहां पेशवा और होल्कर सेना में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करने लगे। रघुनाथ हरी नेवलकर ने बुदेलखंड में मराठा साम्राज्य स्थापित किया था,और जब वे बूढ़े होने लगे तब उन्होंने अपने छोटे भई शिव राव भाऊ को झांसी सौंप दी। 1838 में रघुनाथ राव तृतीय के देहांत के बाद 1843 में ब्रिटिश शासकों ने उनके छोटे भाई गंगाधर राव को झाँसी का राजा घोषित कर दिया। गंगाधर राव का पहला विवाह रमाबाई से हुआ था, जिनकी जल्द ही मृत्यु हो गई। रमाबाई कभी भी झाँसी की महारानी नहीं बनीं क्योंकि रमाबाई की मृत्यु के बाद ही गंगाधर राव ने 1843 में राजा की उपाधि धारण की । दरअसल गंगाधर राव के राजा बन ने के पीछे एक कहानी है । रामचन्द्र राव के कोई बच्चा नहीं था इसलिए इन्होंने अपने भाई रघुनाथ राव के बेटे कृष्णा राव को गोद लिया उस समय शास्त्रों और पंडितों ने कृष्णा राव के गोद लेने को मान्यता नहीं दी इस कारण रामचन्द्र राव ने रघुनाथ राव को राजा बना दिया। रघुनाथ राव एक अयोग्य शासक सिद्ध हुए उनके कारण झांसी की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर होने लगी। इस कारण 1837 में ब्रिटिश शासको ने उनसे सत्ता उनसे छीनकर अपने हाथ में ले ली। रघुनाथ राव के देहांत के बाद फिर से ये सवाल उठा की अब झांसी की सत्ता किसे सौपी जाए। ऐसे में राजा बनने के लिए 4 लोगों के नाम थे रघुनाथ राव के छोटे भाई गंगाधर राव,राम चन्द्र राव के दत्तक पुत्र कृष्णा राव,रघुनाथ राव की महारानी और रघुनाथ राव की दासी गजरा का पुत्र अली बहादुर इन चारो मे से राजा चुन ने के लिये एक कमिशन बनाया गया जिसमे गंगाधर राव को सबसे उपयुक्त उम्मीदावर मानकर उन्हें झांसी की सत्ता सौपी गयी, लेकिन अंग्रेजों ने कुछ अधिकार अपने पास रख लिए क्युकी रघुनाथ राव के शासन काल में झांसी पर कुछ कर्जा हो गया था इसलिए अंग्रेजों ने ये तय किया कि जब तक उन्हें पूरे पैसे नहीं मिल जाते, वे झांसी के शासन में अपना हस्तक्षेप रखेंगे राजा गंगाधर राव एक योग्य शासक थे इसलिए सत्ता मिलने के बाद उन्होंने जब मणिकर्णिका से विवाह किया उसके कुछ सालों में ही अंग्रेजों का सारा कर्जा उतार दिया जब सारा कर्जा उतर गया तब झांसी का पूर्ण शासन लेने की बात आई, तो अंग्रेजों ने झांसी को पूरी तरह से लौटाने पर सहमती सिर्फ इस शर्त पर दी कि गंगाधर को अंग्रेजो की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए एक ब्रिटिश सैन्य टुकड़ी अपने राज्य में रखनी होगी,और इसका पूरा खर्चा भी उठाना होगा. गंगाधर को ना चाहते हुए भी यह शर्त स्वीकार करनी पड़ी। गंगाधर राव ने झांसी को व्यवस्थित करने के लिए बहुत से कार्य किये,उन्होंने कुछ योग्य और अनुभवी मंत्रियों को प्रशासन के लिए नियुक्त किया.फिर उन्होंने अपनी सैन्य टुकड़ियों को व्यवस्थित किया और झाँसी की चारों तरफ से सुरक्षा को सुनिशिचित किया. इस तरह बहुत ही कम समय में झाँसी ने बहुत विकास किया. महाराज गंगाधर राव को हाथी और घोड़ो का बहुत शौक था. उनके पास बहुत से हाथी और घोड़े थे। राज्य और प्रशासन की व्यवस्था सुनिश्चित होने के बाद महाराज गंगाधर राव ने तीर्थ यात्रा पर जाने की योजना बनाई , उन्होंने अपनी पत्नी के साथ तीर्थ यात्रा शुरू की. इस धार्मिक यात्रा में वो गया,प्रयाग होते हुए वाराणसी पहुंचे. वाराणसी रानी लक्ष्मीबाई का जन्म स्थान था,यहाँ पहुंचकर महाराज ने प्रार्थनाए की,दान किया और अन्य धार्मिक कार्य किये. फिर वो झांसी लौट आये और यहाँ उन्होंने सफल धार्मिक यात्रा के लिए बड़ा उत्सव किया। 1851 में रानी लक्ष्मी बाई ने एक पुत्र को जन्म दिया,महाराजा और महारानी की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था. लेकिन विधाता को कुछ और ही मंजूर था उनका यह पुत्र 4 महीनों के बाद दुनिया छोडकर चला गया। अपने पुत्र के जाने के गम में गंगाधर बहुत उदास रहने लगे अक्टूबर 1853 में नवरात्र के दिनों में अपनी कुलदेवी की आराधना करते समय उनकी तबियत अचानक से बिगड़ी और दशहरे के दिन उन्हें तीव्र पेचिश की बीमारी का पता लगा। हालांकि उन्हें लगता हैं की वो अब भी ठीक हो जायेंगे, लेकिन अपने धर्म और कर्तव्य को ध्यान में रखते हुए इन्होंने वासुदेव नेवलकर के पुत्र आनंद राव जो उस समय मात्र 5 साल के बालक थे को सभी धार्मिक अनुष्ठानों के साथ गोद लिया। गोद लेने के बाद आनंद राव का नाम बदलकर दामोदर गंगाधर राव रखा गया गोद लेने के पारम्परिक अनुष्ठान में राज्य के सभी गणमान्य व्यक्ति और बुंदेलखंड के ब्रिटिश राजनायिक मेजर एलिस और लोकल ब्रिटिश आर्मी के अधिकारी कैप्टेन मार्टिन मौजुद थे। जब महाराजा ने गोद लेने की सभी राजकीय प्रक्रियाएं पूरी कर ली तब उन्होंने ब्रिटिश सरकार को एक पत्र लिखवाया कि मैंने जिस 5 साल के बालक को अपना दत्तक पुत्र घोषित किया हैं उसका नाम आनद राव हैं लेकिन वो अब से दामोदर गंगाधर राव के नाम से जाना जायेगा. यह बच्चा हमारे परिवार का ही सदस्य हैं,और रिश्तेदारी में मेरा पौत्र हैं. यदि मैं अभी इस बीमारी से नहीं बच पाऊं तो मुझे उम्मीद हैं की सरकार मेरे इस छोटे से बालक की सुरक्षा करेगी जब तक मेरी पत्नी जीवित हैं वह इस राज्य और मेरे पुत्र की संरक्षक होगी. वह इस पूरे राज्य की प्रशासक होगी इसलिए आप सुनिश्चित करें कि मेरे जाने के बाद मेरी पत्नी को झांसी मे शासन करते हुए किसी समस्या का सामना न करना पड़े।” गंगाधर राव ने यह पत्र मेजर एलिस को दे दिया, उसके तुरंत बाद वो बेहोश हो गये मेजर एलिस और कैप्टेन मार्टिन ने उन्हें दवाई दी और लौट गए. महारनी लक्ष्मी बाई नेपथ्य में अपने पति के पास आकर बैठ गई और दवाई के कारण राजा को नींद आ गयी और रात में 4 बजे राजा ने आँख खोली तब प्रजा अपने प्रिय राजा के स्वास्थ की मंगल कामना के लिए महल के सामने एकत्र हो रखी थी. लेकिन प्रजा की शुभकामना और मेजर एलिस की भाग-दौड़ और अंग्रेज डॉक्टर को बुलाना कहीं काम नहीं आया क्योंकि राजा ने अंग्रेजी उपचार लेने से मना कर दिया और 20 नवम्बर 1853 की मध्य रात्री को महाराजा ने देह त्याग दी।

रास बिहारी बोस को आखिर क्यों जाना पड़ा जापान #Rasbiharibose

रास बिहारी बोस भारत के प्रमुख क्रांतिकारी नेता थे. उनका ग़दर क्रांति और आजाद हिन्द फौज की स्थापना में भी योगदान था। रासबिहारी बोस का जन्म 2...