21 जुलाई 2023

मराठा साम्राज्य के महान पेशवा बालाजी विश्वनाथ की कहानी

बालाजी विश्वनाथ मराठा साम्राज्य के पहले पेशवा थे जब मराठा साम्राज्य शिवाजी की मृत्यु के बाद कमजोर पड़ गया था इन्होने उस समय पेशवाई की नीव रखकर मराठा साम्राज्य को नई शक्ति दी | छत्रपति साहू के शाषनकाल में इन्होंने गृह युद्दो को जीतकर मुगलों को अनेक बार परास्त किया ,इसी वजह से इन्हें “मराठा साम्राज्य का द्वितीय संस्थापक ” भी माना जाता है | उनके बाद उनके पुत्र पेशवा बाजीराव ने मराठा साम्राज्य को आधे भारत में फैला दिया था |
बालाजी विश्वनाथ का जन्म 1 जनवरी 1662 को महाराष्ट्र के वर्तमान रायगढ़ जिले के श्रीवर्धन में हुआ था।इनके पिता का नाम विश्वनाथपंत भट्ट था। बालाजी विश्वनाथ की पत्नी का नाम राधा बाई था। इनके दो पुत्र एवं दो कन्याएँ थीं। बाजीराव जो उनके पश्चात पेशवा बने और पुत्री का नाम भयू बाई और अनु बाई था। 1712 ई. के मध्य बालाजी विश्वनाथ ने पूना और दौलताबाद के सूबेदार के रुप मे कार्य किया । इधर धनाजी जादव की मृत्यु के बाद उसके पुत्र चन्द्रसेन जादव को छत्रपति शाहू ने सेनापति बनाया। परन्तु चन्द्रसेन जादव का ताराबाई के प्रति झुकाव देखकर, उसे सेनापति के पद से हटा दिया, और बालाजी विश्वनाथ को सेनापति बनाया । सेनापति का पद छिन जाने से चन्द्रसेन क्रोधित था, और इसे अपना अपमान समझता था। इस फूट का फायदा उठाकर ताराबाई ने चन्द्रसेन एवं कान्होजी आंगड़े के साथ मिलकर छत्रपति शाहू एवं उनके पेशवा बहिरोपन्त पिंगले को कैद कर लिया। बालाजी विश्वनाथ ने सफल कूटनीति के द्वारा छत्रपति शाहू एवं उनके पेशवा बहिरोपन्त पिंगले को ताराबाई की कैद से आजाद कराया जिस से खुश होकर छत्रपति शाहू ने 1713 ई. में बालाजी को अपना पेशवा बनाया। इतिहास मे थोड़ा पीछे चलने पर पता चलता है कि:- छत्रपति शिवाजी की मृत्यु के बाद उनके दो पुत्र सम्भाजी और राजाराम मुगल साम्राज्य के खिलाफ लडते रहे | औरंगजेब ने 1686 में दक्कन में प्रवेश किया ताकि वो अनुभवहीन मराठा साम्राज्य का पतन कर सके इसलिए अगले 21 वर्षो तक औरंगजेब लगातार दक्कन में मराठो के खिलाफ़ युद्ध करता रहा | क्षत्रपति सम्भाजी और उनके भाई राजाराम की मौत के बाद राजाराम की पत्नी ताराबाई ने मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली क्योंकि उस वक्त सम्भाजी के पुत्र साहू को मुगलों ने बहुत छोटी उम्र मे ही बंदी बना लिया था। 88 वर्ष की उम्र में जब औरंगजेब मरा तो उसकी मौत के साथ ही मुगल सेना भी बिखर गयी और मुगल साम्राज्य पर राजकुमार मुअज्जम को बहादुर शाह नाम के साथ मुगल सिंहासन पर बिठाया गया। इसी के साथ औरंगजेब की मौत के बाद दक्कन के मुगल सेनापति ने साहू को अपनी कैद से मुक्त कर दिया ताकि मराठो में सत्ता के लिए आपसी संघर्ष शुरू हो जाए और हुआ भी यही क्षत्रपति साहू और ताराबाई के बीच सत्ता के लिए संघर्ष शुरू हो गया | ताराबाई ने मराठा सेनापति धनाजी जाधव को शाहू पर आक्रमण करने का आदेश दिया। धनाजी जाधव और क्षत्रपति शाहू की सेना का पुणे में आमना सामना हुआ। लेकिन धनाजी जाधव ने क्षत्रपति शाहू पर आक्रमण करने के बजाय ने उन्हें मराठा साम्राज्य का सही उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। यह सब बालाजी विश्वनाथ की कूटनीति के कारण सम्भव हो पाया। 1708 में छत्रपति शाहू का जब राजतिलक हुआ तब शाहू ने बालाजी विश्वनाथ को मुतालिक बनाया और मराठा दरबार में जगह दी। कोल्हापुर में बालाजी और ताराबाई की सेना के बीच युद्ध हुआ जिसमें बालाजी ने ताराबाई की सेना को हरा दिया , अब बालाजी ने राजाराम की दुसरी पत्नी राजसबाई को उनके पुत्र सम्भाजी द्वितीय को कोल्हापुर के सिंहासन पर बिठाने के लिए उकसाया ताकि ताराबाई के पुत्र शिवाजी द्वितीय को सत्ता से हटाया जा सके। इसके साथ ही कोल्हापुर भी शाहू के नेतृत्व में आ गया। इसके बाद छत्रपति शाहू ने बालाजी की नेतृत्व शक्ति को देखते हुए हुए पेशवा नियुक्त किया , जो वर्तमान में प्रधानमंत्री की तरह होता है। सिंहासन पर छत्रपति शाहू ही बैठते थे लेकिन युद्ध के लिए बालाजी अपनी सेना के साथ जाते थे। बालाजी विश्वनाथ के प्रयासों और पुरुषार्थ से मराठा साम्राज्य अपने उसी गौरवपूर्ण पद को प्राप्त करने में सफल हुआ ,जैसा शिवाजी महाराज के समय प्रतिष्ठित था । उनकी इन सेवाओं का पुरस्कार देते हुए छत्रपति साहू ने उन्हें पेशवा के पद पर बिठाया था । छत्रपति शाहू ने अब पेशवा का पद वंशानुगत कर दिया था। पेशवा पद के वंशानुगत हो जाने के कारण ही बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद उनके पुत्र बाजीराव प्रथम को पेशवा का पद दिया गया। 12 अप्रैल 1720 को मराठा साम्राज्य के इस महान नक्षत्र का देहांत हो गया। इन्होने अपने जीवन में मराठा साम्राज्य के शीर्ष पद को सुशोभित किया । बालाजी विश्वनाथ को 1713 में पेशवा की उपाधि दी गई थी। पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने 1719 में सैय्यद बंधुओं के कहने पर मुगल सम्राट से जो संधि की थी उसमें पेशवा ने अपना पूर्ण राजनीतिक और कूटनीतिक कौशल दिखाया था। जिसके माध्यम से उन्होंने मुगलों की राजनीति में हस्तक्षेप करने का अधिकार मराठों के लिए प्राप्त कर लिया था। वास्तव में यह उनकी बहुत बड़ी कूटनीतिक सफलता थी। तभी तो इस सन्धि को सर रिचर्ड टेम्पल ने मराठा साम्राज्य का मैग्नाकार्टा कहा है।

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