29 जुलाई 2023

Biography of Bhikaiji Cama।विदेश में फहराया भारत का झंडा

श्रीमती भीखाजी जी कामा भारतीय मूल की फ्रांसीसी नागरिक थीं जिन्होने लन्दन, जर्मनी तथा अमेरिका मे भारत की स्वतंत्रता के लिए लोगो को जागरूक किया।
इन्हें 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टटगार्ट नगर में हुई सातवीं अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस की सभा में पहली बार भारत का राष्ट्रध्वज फहराने के लिए जाना जाता हैं। उस समय तिरंगा वैसा नहीं था जैसा आज है। उस झंडे में देश के विभिन्न धर्मों की भावनाओं और संस्कृति को समेटने की कोशिश की गई थी। उसमें इस्लाम, हिंदुत्व और बौद्ध मत को प्रदर्शित करने के लिए हरा, पीला और लाल रंग इस्तेमाल किया गया था। साथ ही उसमें बीच में देवनागरी लिपि में ̔वंदे मातरम् लिखा हुआ था । राष्ट्रध्वज फहराने के बाद इन्होंने लोगों से अपील की और कहा "इस झंडे के नाम पर मैं दुनिया भर के स्वतंत्रता प्रेमियों से इस संघर्ष का समर्थन करने की अपील करती हूं यह स्वतंत्र भारत का झंडा है। मैं सभी सज्जनों से अपील करती हूं कि वह खड़े होकर राष्ट्रध्वज को सलामी दें।” बाद में इस ध्वज को भारत सरकार द्वारा आम जनता के लिए एक ऐतिहासिक स्मृति के रूप में पुणे में मराठा और केसरी पुस्तकालय में प्रदर्शित किया गया था। भीकाजी कामा का जन्म 24 सितम्बर 1861 को बम्बई में एक पारसी परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम सोराबजी पटेल था। भीखाजी के नौ भाई-बहन थे। इनका विवाह 1885 में एक पारसी समाज सुधारक रुस्तम जी कामा से हुआ था। भीकाजी कामा को मैडम कामा तथा मैडम भीकाजी रुस्तम कामा के नाम से जाना जाता है। आजादी की लड़ाई में उनके योगदान के लिए उन्हें देश की बेटी और मदर आफ इंडियन रिवॉल्यूशन के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने अपनी शिक्षा एलेक्जेंड्रा नेटिव गल्र्स संस्थान में पूरी की थी। बॉम्बे शहर मे सितंबर 1896 में प्लेग फैलने लगा जिसके बाद ब्रिटिश सरकार ने बॉम्बे को प्लेग संक्रमित शहर घोषित किया। भीकाजी कामा ने प्लेग प्रभावित रोगियों की देखभाल और सेवा की। रोगियों की देखभाल के दौरान वह भी बीमारी की चपेट मे आ गयीं जिसके बाद वह अपने इलाज के लिए डॉक्टरों की सलाह पर यूरोप चली गई। 1902 मे छह साल बाद भिकाजी कामा ने लंदन में रहने का फैसला किया। भीकाजी कामा लंदन में दादाभाई नौरोजी के संपर्क में आईं। जो इंग्लैंड में भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ब्रिटिश समिति के नेता थे। दादाभाई नौरोजी के देशभक्ति के विचारों से प्रभावित होकर भीकाजी कामा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गई और दादाभाई नौरोजी के सहायक के रूप में काम करने लगी। इंग्लैंड में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ब्रिटिश समिति में शामिल होने के तुरंत बाद उन्होंने लाला हरदयाल और श्यामजी कृष्ण वर्मा के साथ लंदन के हाइड पार्क में लोगो को संबोधित करना शुरू किया श्यामजी कृष्ण वर्मा ने फरवरी 1905 में इंडियन होम रूल सोसाइटी नामक एक संगठन की स्थापना की, जिसमें भिकाजी कामा शामिल हुई। कुछ साल बाद भीकाजी कामा, दादाभाई नौरोजी और सिंह रेवाभाई राणा को ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के कारण लंदन छोड़ने का नोटिस थमा दिया। पुलिस ने उन्हें ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों में शामिल न होने की शर्त पर लंदन में रहने का एक और मौका दिया। लेकिन इन्होंने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और पेरिस चली गई। फ्रांस में उन्होंने अन्य भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों जैसे एस आर राणा और मुंचेरशाह बुर्जोरजी के साथ पेरिस इंडियन सोसाइटी की स्थापना की। विदेशी धरती पर भारतीय स्वतंत्रता के लिए आंदोलन के कारण फ्रांसीसी पुलिस ने कामा को आत्मसमर्पण करने के लिए नोटिस जारी किया कामा फ्रांसीसी सरकार की शर्तों से सहमत नहीं थी। अंग्रेजों ने फ्रांस सरकार के सहयोग से इंग्लैंड में भिकाजी कामा की सारी संपत्तियां जब्त कर ली। जल्द ही फ्रांस सरकार ने भी उन्हें फ्रांस छोड़ने का आदेश दिया। उसी समय एक रूसी क्रांतिकारी और राजनीतिज्ञ व्लादिमीर लेनिन ने भिकाजी कामा को सोवियत संघ में आमंत्रित किया, जिसे इन्होंने अस्वीकार कर दिया। वर्ष 1920 में भीकाजी कामा हेराबाई और मिथन टाटा नाम की दो पारसी महिलाओं से मिली जो महिलाओं को वोट देने के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहीं थीं इन महिलाओं से मिलने के बाद भिकाजी ने टिप्पणी की-"भारत की आजादी के लिए काम करें। जब भारत स्वतंत्र होगा तो महिलाओं को न केवल वोट देने का अधिकार होगा, बल्कि अन्य सभी अधिकार होंगे” भीकाजी कामा यूरोप में रहने के दौरान paralysis की चपेट मे आ गयी । 24 जून 1935 को उन्होंने सर कोवासजी जहांगीर के माध्यम से ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखा कि मैं पेरिस छोड़ कर जा रही हूँ और आंदोलनकारियों से अनुरोध किया की वह वापस भारत चले जाए। एक साल बाद लंबी बीमारी के कारण बॉम्बे के पारसी अस्पताल में 13 अगस्त 1936 में उनकी मृत्यु हो गई। भिकाजी कामा की मृत्यु के बाद उनका निजी सामान और संपत्ति बॉम्बे में लड़कियों के लिए अवाबाई पेटिट अनाथालय नामक एक ट्रस्ट को सौंप दिया गया था। बाद में इस अनाथालय का नाम बदलकर बाई अवाबाई फ्रामजी पेटिट गर्ल्स हाई स्कूल, मुंबई कर दिया गया। भारत की स्वतन्त्रता के संघर्ष में उनके बलिदान और सम्मान के लिए बॉम्बे की विभिन्न सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया। भारत के 11वें गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 1962 को भारतीय डाक एवं तार विभाग ने उनके नाम पर 15 पैसे का डाक टिकट जारी किया था। वर्ष 1977 में भारतीय तटरक्षक आयोग ने ‘प्रियदर्शिनी-श्रेणी के तेज गश्ती पोत ICGS भिकाईजी कामा’ नामक एक जहाज का नामकरण किया। दक्षिण दिल्ली में भिकाजी कामा के नाम पर एक आधिकारिक इमारत का निर्माण किया गया जो , जिंदल समूह, सेल, गेल और EIEL जैसे कार्यालयों के लिए प्रदान की गई थी। वर्ष 2016 में एक भारतीय लेखक भोला यामिनी द्वारा ‘द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ मैडम भिकाजी कामा’ शीर्षक से एक पुस्तक प्रकाशित की गई थी।

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