नमस्कार दोस्तों मेरा नाम है प्रियंका शर्मा, जैसा कि हमारे Vlog का नाम है "theheroes" इस पर आपको मिलेंगी भारत के महान व्यक्तियों के बारे मे संपूर्ण जानकारी जिन्होंने अपने राष्ट्र और राष्ट्रीयता के लिए अपना पूरा जीवन खपाया। अपने आदर्श कार्यो से आने वाली पीढ़ी के लिए एक मशाल कायम की।
29 जुलाई 2023
Biography of Bhikaiji Cama।विदेश में फहराया भारत का झंडा
श्रीमती भीखाजी जी कामा भारतीय मूल की फ्रांसीसी नागरिक थीं जिन्होने लन्दन, जर्मनी तथा अमेरिका मे भारत की स्वतंत्रता के लिए लोगो को जागरूक किया।
इन्हें 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टटगार्ट नगर में हुई सातवीं अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस की सभा में पहली बार भारत का राष्ट्रध्वज फहराने के लिए जाना जाता हैं। उस समय तिरंगा वैसा नहीं था जैसा आज है।
उस झंडे में देश के विभिन्न धर्मों की भावनाओं और संस्कृति को समेटने की कोशिश की गई थी। उसमें इस्लाम, हिंदुत्व और बौद्ध मत को प्रदर्शित करने के लिए हरा, पीला और लाल रंग इस्तेमाल किया गया था। साथ ही उसमें बीच में देवनागरी लिपि में ̔वंदे मातरम् लिखा हुआ था । राष्ट्रध्वज फहराने के बाद इन्होंने लोगों से अपील की और कहा "इस झंडे के नाम पर मैं दुनिया भर के स्वतंत्रता प्रेमियों से इस संघर्ष का समर्थन करने की अपील करती हूं यह स्वतंत्र भारत का झंडा है। मैं सभी सज्जनों से अपील करती हूं कि वह खड़े होकर राष्ट्रध्वज को सलामी दें।”
बाद में इस ध्वज को भारत सरकार द्वारा आम जनता के लिए एक ऐतिहासिक स्मृति के रूप में पुणे में मराठा और केसरी पुस्तकालय में प्रदर्शित किया गया था।
भीकाजी कामा का जन्म 24 सितम्बर 1861 को बम्बई में एक पारसी परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम सोराबजी पटेल था। भीखाजी के नौ भाई-बहन थे। इनका विवाह 1885 में एक पारसी समाज सुधारक रुस्तम जी कामा से हुआ था।
भीकाजी कामा को मैडम कामा तथा मैडम भीकाजी रुस्तम कामा के नाम से जाना जाता है। आजादी की लड़ाई में उनके योगदान के लिए उन्हें देश की बेटी और मदर आफ इंडियन रिवॉल्यूशन के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने अपनी शिक्षा एलेक्जेंड्रा नेटिव गल्र्स संस्थान में पूरी की थी।
बॉम्बे शहर मे सितंबर 1896 में प्लेग फैलने लगा जिसके बाद ब्रिटिश सरकार ने बॉम्बे को प्लेग संक्रमित शहर घोषित किया। भीकाजी कामा ने प्लेग प्रभावित रोगियों की देखभाल और सेवा की। रोगियों की देखभाल के दौरान वह भी बीमारी की चपेट मे आ गयीं
जिसके बाद वह अपने इलाज के लिए डॉक्टरों की सलाह पर यूरोप चली गई। 1902 मे छह साल बाद भिकाजी कामा ने लंदन में रहने का फैसला किया।
भीकाजी कामा लंदन में दादाभाई नौरोजी के संपर्क में आईं। जो इंग्लैंड में भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ब्रिटिश समिति के नेता थे। दादाभाई नौरोजी के देशभक्ति के विचारों से प्रभावित होकर भीकाजी कामा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गई और दादाभाई नौरोजी के सहायक के रूप में काम करने लगी। इंग्लैंड में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ब्रिटिश समिति में शामिल होने के तुरंत बाद उन्होंने लाला हरदयाल और श्यामजी कृष्ण वर्मा के साथ लंदन के हाइड पार्क में लोगो को संबोधित करना शुरू किया
श्यामजी कृष्ण वर्मा ने फरवरी 1905 में इंडियन होम रूल सोसाइटी नामक एक संगठन की स्थापना की, जिसमें भिकाजी कामा शामिल हुई। कुछ साल बाद भीकाजी कामा, दादाभाई नौरोजी और सिंह रेवाभाई राणा को ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के कारण लंदन छोड़ने का नोटिस थमा दिया।
पुलिस ने उन्हें ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों में शामिल न होने की शर्त पर लंदन में रहने का एक और मौका दिया। लेकिन इन्होंने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और पेरिस चली गई। फ्रांस में उन्होंने अन्य भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों जैसे एस आर राणा और मुंचेरशाह बुर्जोरजी के साथ पेरिस इंडियन सोसाइटी की स्थापना की।
विदेशी धरती पर भारतीय स्वतंत्रता के लिए आंदोलन के कारण फ्रांसीसी पुलिस ने कामा को आत्मसमर्पण करने के लिए नोटिस जारी किया कामा फ्रांसीसी सरकार की शर्तों से सहमत नहीं थी। अंग्रेजों ने फ्रांस सरकार के सहयोग से इंग्लैंड में भिकाजी कामा की सारी संपत्तियां जब्त कर ली। जल्द ही फ्रांस सरकार ने भी उन्हें फ्रांस छोड़ने का आदेश दिया। उसी समय एक रूसी क्रांतिकारी और राजनीतिज्ञ व्लादिमीर लेनिन ने भिकाजी कामा को सोवियत संघ में आमंत्रित किया, जिसे इन्होंने अस्वीकार कर दिया।
वर्ष 1920 में भीकाजी कामा हेराबाई और मिथन टाटा नाम की दो पारसी महिलाओं से मिली जो महिलाओं को वोट देने के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहीं थीं इन महिलाओं से मिलने के बाद भिकाजी ने टिप्पणी की-"भारत की आजादी के लिए काम करें। जब भारत स्वतंत्र होगा तो महिलाओं को न केवल वोट देने का अधिकार होगा, बल्कि अन्य सभी अधिकार होंगे”
भीकाजी कामा यूरोप में रहने के दौरान paralysis की चपेट मे आ गयी । 24 जून 1935 को उन्होंने सर कोवासजी जहांगीर के माध्यम से ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखा कि मैं पेरिस छोड़ कर जा रही हूँ और आंदोलनकारियों से अनुरोध किया की वह वापस भारत चले जाए। एक साल बाद लंबी बीमारी के कारण बॉम्बे के पारसी अस्पताल में 13 अगस्त 1936 में उनकी मृत्यु हो गई।
भिकाजी कामा की मृत्यु के बाद उनका निजी सामान और संपत्ति बॉम्बे में लड़कियों के लिए अवाबाई पेटिट अनाथालय नामक एक ट्रस्ट को सौंप दिया गया था। बाद में इस अनाथालय का नाम बदलकर बाई अवाबाई फ्रामजी पेटिट गर्ल्स हाई स्कूल, मुंबई कर दिया गया।
भारत की स्वतन्त्रता के संघर्ष में उनके बलिदान और सम्मान के लिए बॉम्बे की विभिन्न सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया।
भारत के 11वें गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 1962 को भारतीय डाक एवं तार विभाग ने उनके नाम पर 15 पैसे का डाक टिकट जारी किया था।
वर्ष 1977 में भारतीय तटरक्षक आयोग ने ‘प्रियदर्शिनी-श्रेणी के तेज गश्ती पोत ICGS भिकाईजी कामा’ नामक एक जहाज का नामकरण किया।
दक्षिण दिल्ली में भिकाजी कामा के नाम पर एक आधिकारिक इमारत का निर्माण किया गया जो , जिंदल समूह, सेल, गेल और EIEL जैसे कार्यालयों के लिए प्रदान की गई थी।
वर्ष 2016 में एक भारतीय लेखक भोला यामिनी द्वारा ‘द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ मैडम भिकाजी कामा’ शीर्षक से एक पुस्तक प्रकाशित की गई थी।
21 जुलाई 2023
मराठा साम्राज्य के महान पेशवा बालाजी विश्वनाथ की कहानी
बालाजी विश्वनाथ मराठा साम्राज्य के पहले पेशवा थे जब मराठा साम्राज्य शिवाजी की मृत्यु के बाद कमजोर पड़ गया था इन्होने उस समय पेशवाई की नीव रखकर मराठा साम्राज्य को नई शक्ति दी | छत्रपति साहू के शाषनकाल में इन्होंने गृह युद्दो को जीतकर मुगलों को अनेक बार परास्त किया ,इसी वजह से इन्हें “मराठा साम्राज्य का द्वितीय संस्थापक ” भी माना जाता है | उनके बाद उनके पुत्र पेशवा बाजीराव ने मराठा साम्राज्य को आधे भारत में फैला दिया था |
बालाजी विश्वनाथ का जन्म 1 जनवरी 1662 को महाराष्ट्र के वर्तमान रायगढ़ जिले के श्रीवर्धन में हुआ था।इनके पिता का नाम विश्वनाथपंत भट्ट था।
बालाजी विश्वनाथ की पत्नी का नाम राधा बाई था। इनके दो पुत्र एवं दो कन्याएँ थीं। बाजीराव जो उनके पश्चात पेशवा बने और पुत्री का नाम भयू बाई और अनु बाई था।
1712 ई. के मध्य बालाजी विश्वनाथ ने पूना और दौलताबाद के सूबेदार के रुप मे कार्य किया ।
इधर धनाजी जादव की मृत्यु के बाद उसके पुत्र चन्द्रसेन जादव को छत्रपति शाहू ने सेनापति बनाया। परन्तु चन्द्रसेन जादव का ताराबाई के प्रति झुकाव देखकर, उसे सेनापति के पद से हटा दिया, और बालाजी विश्वनाथ को सेनापति बनाया ।
सेनापति का पद छिन जाने से चन्द्रसेन क्रोधित था, और इसे अपना अपमान समझता था।
इस फूट का फायदा उठाकर ताराबाई ने चन्द्रसेन एवं कान्होजी आंगड़े के साथ मिलकर छत्रपति शाहू एवं उनके पेशवा बहिरोपन्त पिंगले को कैद कर लिया।
बालाजी विश्वनाथ ने सफल कूटनीति के द्वारा छत्रपति शाहू एवं उनके पेशवा बहिरोपन्त पिंगले को ताराबाई की कैद से आजाद कराया जिस से खुश होकर छत्रपति शाहू ने 1713 ई. में बालाजी को अपना पेशवा बनाया।
इतिहास मे थोड़ा पीछे चलने पर पता चलता है कि:-
छत्रपति शिवाजी की मृत्यु के बाद उनके दो पुत्र सम्भाजी और राजाराम मुगल साम्राज्य के खिलाफ लडते रहे | औरंगजेब ने 1686 में दक्कन में प्रवेश किया ताकि वो अनुभवहीन मराठा साम्राज्य का पतन कर सके इसलिए अगले 21 वर्षो तक औरंगजेब लगातार दक्कन में मराठो के खिलाफ़ युद्ध करता रहा |
क्षत्रपति सम्भाजी और उनके भाई राजाराम की मौत के बाद राजाराम की पत्नी ताराबाई ने मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली क्योंकि उस वक्त सम्भाजी के पुत्र साहू को मुगलों ने बहुत छोटी उम्र मे ही बंदी बना लिया था।
88 वर्ष की उम्र में जब औरंगजेब मरा तो उसकी मौत के साथ ही मुगल सेना भी बिखर गयी
और मुगल साम्राज्य पर राजकुमार मुअज्जम को बहादुर शाह नाम के साथ मुगल सिंहासन पर बिठाया गया।
इसी के साथ औरंगजेब की मौत के बाद दक्कन के मुगल सेनापति ने साहू को अपनी कैद से मुक्त कर दिया ताकि मराठो में सत्ता के लिए आपसी संघर्ष शुरू हो जाए और हुआ भी यही क्षत्रपति साहू और ताराबाई के बीच सत्ता के लिए संघर्ष शुरू हो गया | ताराबाई ने मराठा सेनापति धनाजी जाधव को शाहू पर आक्रमण करने का आदेश दिया।
धनाजी जाधव और क्षत्रपति शाहू की सेना का पुणे में आमना सामना हुआ।
लेकिन धनाजी जाधव ने क्षत्रपति शाहू पर आक्रमण करने के बजाय ने उन्हें मराठा साम्राज्य का सही उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।
यह सब बालाजी विश्वनाथ की कूटनीति के कारण सम्भव हो पाया।
1708 में छत्रपति शाहू का जब राजतिलक हुआ तब शाहू ने बालाजी विश्वनाथ को मुतालिक बनाया और मराठा दरबार में जगह दी।
कोल्हापुर में बालाजी और ताराबाई की सेना के बीच युद्ध हुआ जिसमें बालाजी ने ताराबाई की सेना को हरा दिया ,
अब बालाजी ने राजाराम की दुसरी पत्नी राजसबाई को उनके पुत्र सम्भाजी द्वितीय को कोल्हापुर के सिंहासन पर बिठाने के लिए उकसाया ताकि ताराबाई के पुत्र शिवाजी द्वितीय को सत्ता से हटाया जा सके। इसके साथ ही कोल्हापुर भी शाहू के नेतृत्व में आ गया। इसके बाद छत्रपति शाहू ने बालाजी की नेतृत्व शक्ति को देखते हुए हुए पेशवा नियुक्त किया , जो वर्तमान में प्रधानमंत्री की तरह होता है। सिंहासन पर छत्रपति शाहू ही बैठते थे लेकिन युद्ध के लिए बालाजी अपनी सेना के साथ जाते थे।
बालाजी विश्वनाथ के प्रयासों और पुरुषार्थ से मराठा साम्राज्य अपने उसी गौरवपूर्ण पद को प्राप्त करने में सफल हुआ ,जैसा शिवाजी महाराज के समय प्रतिष्ठित था । उनकी इन सेवाओं का पुरस्कार देते हुए छत्रपति साहू ने उन्हें पेशवा के पद पर बिठाया था । छत्रपति शाहू ने अब पेशवा का पद वंशानुगत कर दिया था।
पेशवा पद के वंशानुगत हो जाने के कारण ही बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद उनके पुत्र बाजीराव प्रथम को पेशवा का पद दिया गया।
12 अप्रैल 1720 को मराठा साम्राज्य के इस महान नक्षत्र का देहांत हो गया।
इन्होने अपने जीवन में मराठा साम्राज्य के शीर्ष पद को सुशोभित किया । बालाजी विश्वनाथ को 1713 में पेशवा की उपाधि दी गई थी। पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने 1719 में सैय्यद बंधुओं के कहने पर मुगल सम्राट से जो संधि की थी उसमें पेशवा ने अपना पूर्ण राजनीतिक और कूटनीतिक कौशल दिखाया था। जिसके माध्यम से उन्होंने मुगलों की राजनीति में हस्तक्षेप करने का अधिकार मराठों के लिए प्राप्त कर लिया था।
वास्तव में यह उनकी बहुत बड़ी कूटनीतिक सफलता थी। तभी तो इस सन्धि को सर रिचर्ड टेम्पल ने मराठा साम्राज्य का मैग्नाकार्टा कहा है।
15 जुलाई 2023
वीर कुंवर सिंह का इतिहास और शौर्यगाथा
कुंवर सिंह का जन्म एक राजपूत परिवार मे हुआ था। इनको 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महानायक के रूप मे भी जाना जाता है
वीर कुंवर सिंह का जन्म 13 नवम्बर 1777 को बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर नामक गांव में हुआ था। इनका परिवार एक क्षत्रिय जमीनदार परिवार था। इनके पिता का नाम बाबू साहबजादा सिंह और माता का नाम पंचरतन कुंवर था।
कुंवर सिंह प्रसिद्ध परमार राजपूत शासक राजा भोज के वंशजों में से थे। इसी वंश में महान चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने भी जन्म लिया था। 80 साल की उम्र में कुंवर सिंह ने अंग्रेजों का सामना किया और हाथ में गोली लगने के बाद अपना हाथ खुद ही काट लिया था।
इनके छोटे भाई अमर सिंह और दयालु सिंह थे।बचपन से ही इनको खेलने की बजाय घुड़सवारी, निशानेबाज़ी, तलवारबाज़ी सीखने का शौक था।
वीर कुंवर सिंह मुजरा देखने के शौकीन थे ।इतिहास की मानें तो कहा जाता है कि कुंवर सिंह धरमन बाई का मुजरा देखने जाया करते थे और यही पर धरमन बाई और कुंवर एक दूसरे से प्यार करने लगे और अंत में इन्होंने शादी भी कर ली । धरमन बाई और करमन बाई दो बहने हुआ करती थी । जो बिहार के शहर जगदीशपुर के एक नुक्कड़ पर मुजरे का कार्यक्रम किया करती थी । उन्होंने करमन बाई के नाम पर एक टोला बसा डाला । जो कि आज भी बिहार के जगदीशपुर में स्थित है । वह धरमन बाई से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने धरमन चौक का निर्माण करवा दिया।
कुंवर सिंह, ने ब्रिटिश औपनिवेशिक ताकतों के खिलाफ कई लड़ाइया लडी।
इनके द्वारा लड़ी गई शुरुआती लड़ाइयों में से एक जगदीशपुर की लड़ाई थी,जो मई 1857 में हुई थी। कुंवर सिंह, उस समय 80 वर्ष के थे, इन्होने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने के लिए सशस्त्र किसानों के एक समूह का नेतृत्व किया। विद्रोहियो की इस भीड ने जगदीशपुर में ब्रिटिश चौकी पर हमला किया और उनके हथियार और गोला-बारूद जब्त कर लिए।
जगदीशपुर की लड़ाई के बाद, कुंवर सिंह ने बिहार के आरा की ओर कूच किया, यहा अंग्रेजों ने 50 सैनिकों की एक छोटी चौकी स्थापित की थी, कुंवर सिंह और उनके सैनिकों ने कई हफ्तों तक इस चौकी की घेराबंदी की।
बिहार के छपरा मे अंग्रेजों ने लगभग 200 सैनिकों की एक चौकी तैनात की थी, जिसकी कमान कैप्टन ले ग्रैंड के पास थी। कुंवर सिंह और उनके सैनिकों ने ब्रिटिश सेना के साथ भीषण युद्ध किया। कम संख्या में होने के बावजूद, विद्रोहियों ने अंग्रेजों को भारी नुकसान पहुंचाया और उन्हें शहर से पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया।
मीरानपुर कटरा में मेजर विंसेंट आइरे की कमान में एक ब्रिटिश सेना द्वारा उन्हें रोक दिया गया था। विद्रोहियों ने अंग्रेजों के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी, लेकिन अंततः उनके पास तोपखाने और आधुनिक हथियारों की कमी के कारण हार गए। कुंवर सिंह युद्ध में घायल हो गए और उन्हें अपने गृहनगर जगदीशपुर वापस जाना पड़ा।
मीरानपुर कटरा की लड़ाई के बाद, वीर कुंवर सिंह ने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई, जिसमें ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा
युद्ध नीति तथा रणनीति में माहिर कुवर सिंह अंग्रेजों के कट्टर दुश्मन बन चुके थे । ब्रिटिश शासन के एक सिपाही डगलस ने कुंवर सिंह को पकड़ने की योजना बनाई डग्लस को सूचना मिली कि कुंवर सिंह अपने कुछ साथियों के साथ गंगा नदी को पार कर रहे हैं । डग्लस अपनी सेना लेकर गंगा नदी के पास पहुंच गया ।जिस नाव पर कुंवर सिंह तथा उनके कुछ साथी सवार थे डगलस ने उस पर अंधाधुंध फायरिंग करवा दी । जिसमे एक गोली कुंवर सिंह की बांह पर जा लगी ।
गोली लगने के बाद कुंवर सिंह अपने महल लौट आए । जहां वे महज 3 दिन ही बिता सकें। उसके पश्चात 26 अप्रैल 1858 में वीर कुंवर सिंह का देहांत हो गया।
वीर कुंवर सिंह ने ब्रिटिश सेना के खिलाफ लड़ाइयों करके 1857 के भारतीय विद्रोह में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। एक बुजुर्ग व्यक्ति होने के बावजूद, उन्होंने आजादी की लड़ाई में अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प का प्रदर्शन किया।
ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने कुंवर सिंह के विषय में लिखा “उस 80 साल के बूढ़े ने ब्रिटिश सरकार की नीव हिला के रख दी थी । यदि वह जवानी के दिनों में होता तो यकीनन 1857 से पहले ही भारत को ब्रिटिश सरकार से आजादी मिल जाती”
बिहार के जगदीशपुर में बीच सड़क पर एक चौक पर वीर कुंवर सिंह की विशाल मूर्ति उनकी उपलब्धि में शामिल है ।
भारत के इस महान स्वतंत्रता सेनानी के ऊपर कई प्रसिद्ध पुस्तकों लिखी गयी है जैसे।
“बायोग्राफी ऑफ कुंवर सिंह एवं अमर सिंह”
“वीर कुंवर सिंह द ग्रेट वारियर ऑफ 1857”
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान का सम्मान करने के लिए, भारतीय सरकार ने 23 अप्रैल 1966 को एक डाक टिकट जारी किया।
बिहार सरकार ने 1992 में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, अर्रा की स्थापना की
2017 में, वीर कुंवर सिंह सेतु, जिसे अर्राह-छपरा पुल भी कहा जाता है, का उद्घाटन उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने के लिए किया गया था।
2018 में, कुंवर सिंह की मृत्यु की 160 वीं वर्षगांठ मनाने के लिए, बिहार सरकार ने हार्डिंग पार्क में उनकी एक प्रतिमा का पदार्पण किया। पार्क को आधिकारिक तौर पर "वीर कुंवर सिंह आजादी पार्क" के रूप में भी नामित किया गया था।
05 जुलाई 2023
गंगाधर राव नेवालकर का जीवन परिचय
गंगाधर राव का जन्म 1814 मे हुआ था इनके पिता का नाम शिव राव भाऊ नेवालकर और माता का नाम पद्मा बाई था।
गंगाधर राव नेवालकर उत्तर भारत में स्थित झाँसी के 5वें राजा थे, जो की झाँसी के पहले शासक रघुनाथ हरी नेवलकर के वंशज थे।
गंगाधर राव के पूर्वज महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले से आये थे पेशवाओ के शासन काल में इनमे से कुछ खानदेश चले गए और वहां पेशवा और होल्कर सेना में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करने लगे। रघुनाथ हरी नेवलकर ने बुदेलखंड में मराठा साम्राज्य स्थापित किया था,और जब वे बूढ़े होने लगे तब उन्होंने अपने छोटे भई शिव राव भाऊ को झांसी सौंप दी।
1838 में रघुनाथ राव तृतीय के देहांत के बाद 1843 में ब्रिटिश शासकों ने उनके छोटे भाई गंगाधर राव को झाँसी का राजा घोषित कर दिया।
गंगाधर राव का पहला विवाह रमाबाई से हुआ था, जिनकी जल्द ही मृत्यु हो गई। रमाबाई कभी भी झाँसी की महारानी नहीं बनीं क्योंकि रमाबाई की मृत्यु के बाद ही गंगाधर राव ने 1843 में राजा की उपाधि धारण की ।
दरअसल गंगाधर राव के राजा बन ने के पीछे एक कहानी है ।
रामचन्द्र राव के कोई बच्चा नहीं था इसलिए इन्होंने अपने भाई रघुनाथ राव के बेटे कृष्णा राव को गोद लिया उस समय शास्त्रों और पंडितों ने कृष्णा राव के गोद लेने को मान्यता नहीं दी इस कारण रामचन्द्र राव ने रघुनाथ राव को राजा बना दिया।
रघुनाथ राव एक अयोग्य शासक सिद्ध हुए उनके कारण झांसी की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर होने लगी।
इस कारण 1837 में ब्रिटिश शासको ने उनसे सत्ता उनसे छीनकर अपने हाथ में ले ली।
रघुनाथ राव के देहांत के बाद फिर से ये सवाल उठा की अब झांसी की सत्ता किसे सौपी जाए।
ऐसे में राजा बनने के लिए 4 लोगों के नाम थे रघुनाथ राव के छोटे भाई गंगाधर राव,राम चन्द्र राव के दत्तक पुत्र कृष्णा राव,रघुनाथ राव की महारानी और रघुनाथ राव की दासी गजरा का पुत्र अली बहादुर
इन चारो मे से राजा चुन ने के लिये एक कमिशन बनाया गया जिसमे गंगाधर राव को सबसे उपयुक्त उम्मीदावर मानकर उन्हें झांसी की सत्ता सौपी गयी, लेकिन अंग्रेजों ने कुछ अधिकार अपने पास रख लिए क्युकी रघुनाथ राव के शासन काल में झांसी पर कुछ कर्जा हो गया था इसलिए अंग्रेजों ने ये तय किया कि जब तक उन्हें पूरे पैसे नहीं मिल जाते, वे झांसी के शासन में अपना हस्तक्षेप रखेंगे
राजा गंगाधर राव एक योग्य शासक थे इसलिए सत्ता मिलने के बाद उन्होंने जब मणिकर्णिका से विवाह किया उसके कुछ सालों में ही अंग्रेजों का सारा कर्जा उतार दिया जब सारा कर्जा उतर गया तब झांसी का पूर्ण शासन लेने की बात आई, तो अंग्रेजों ने झांसी को पूरी तरह से लौटाने पर सहमती सिर्फ इस शर्त पर दी कि गंगाधर को अंग्रेजो की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए एक ब्रिटिश सैन्य टुकड़ी अपने राज्य में रखनी होगी,और इसका पूरा खर्चा भी उठाना होगा. गंगाधर को ना चाहते हुए भी यह शर्त स्वीकार करनी पड़ी।
गंगाधर राव ने झांसी को व्यवस्थित करने के लिए बहुत से कार्य किये,उन्होंने कुछ योग्य और अनुभवी मंत्रियों को प्रशासन के लिए नियुक्त किया.फिर उन्होंने अपनी सैन्य टुकड़ियों को व्यवस्थित किया और झाँसी की चारों तरफ से सुरक्षा को सुनिशिचित किया. इस तरह बहुत ही कम समय में झाँसी ने बहुत विकास किया. महाराज गंगाधर राव को हाथी और घोड़ो का बहुत शौक था. उनके पास बहुत से हाथी और घोड़े थे।
राज्य और प्रशासन की व्यवस्था सुनिश्चित होने के बाद महाराज गंगाधर राव ने तीर्थ यात्रा पर जाने की योजना बनाई , उन्होंने अपनी पत्नी के साथ तीर्थ यात्रा शुरू की. इस धार्मिक यात्रा में वो गया,प्रयाग होते हुए वाराणसी पहुंचे. वाराणसी रानी लक्ष्मीबाई का जन्म स्थान था,यहाँ पहुंचकर महाराज ने प्रार्थनाए की,दान किया और अन्य धार्मिक कार्य किये. फिर वो झांसी लौट आये और यहाँ उन्होंने सफल धार्मिक यात्रा के लिए बड़ा उत्सव किया।
1851 में रानी लक्ष्मी बाई ने एक पुत्र को जन्म दिया,महाराजा और महारानी की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था. लेकिन विधाता को कुछ और ही मंजूर था उनका यह पुत्र 4 महीनों के बाद दुनिया छोडकर चला गया।
अपने पुत्र के जाने के गम में गंगाधर बहुत उदास रहने लगे अक्टूबर 1853 में नवरात्र के दिनों में अपनी कुलदेवी की आराधना करते समय उनकी तबियत अचानक से बिगड़ी और दशहरे के दिन उन्हें तीव्र पेचिश की बीमारी का पता लगा।
हालांकि उन्हें लगता हैं की वो अब भी ठीक हो जायेंगे, लेकिन अपने धर्म और कर्तव्य को ध्यान में रखते हुए इन्होंने वासुदेव नेवलकर के पुत्र आनंद राव जो उस समय मात्र 5 साल के बालक थे को सभी धार्मिक अनुष्ठानों के साथ गोद लिया।
गोद लेने के बाद आनंद राव का नाम बदलकर दामोदर गंगाधर राव रखा गया गोद लेने के पारम्परिक अनुष्ठान में राज्य के सभी गणमान्य व्यक्ति और बुंदेलखंड के ब्रिटिश राजनायिक मेजर एलिस और लोकल ब्रिटिश आर्मी के अधिकारी कैप्टेन मार्टिन मौजुद थे।
जब महाराजा ने गोद लेने की सभी राजकीय प्रक्रियाएं पूरी कर ली तब उन्होंने ब्रिटिश सरकार को एक पत्र लिखवाया कि
मैंने जिस 5 साल के बालक को अपना दत्तक पुत्र घोषित किया हैं उसका नाम आनद राव हैं लेकिन वो अब से दामोदर गंगाधर राव के नाम से जाना जायेगा. यह बच्चा हमारे परिवार का ही सदस्य हैं,और रिश्तेदारी में मेरा पौत्र हैं. यदि मैं अभी इस बीमारी से नहीं बच पाऊं तो मुझे उम्मीद हैं की सरकार मेरे इस छोटे से बालक की सुरक्षा करेगी जब तक मेरी पत्नी जीवित हैं वह इस राज्य और मेरे पुत्र की संरक्षक होगी. वह इस पूरे राज्य की प्रशासक होगी इसलिए आप सुनिश्चित करें कि मेरे जाने के बाद मेरी पत्नी को झांसी मे शासन करते हुए किसी समस्या का सामना न करना पड़े।”
गंगाधर राव ने यह पत्र मेजर एलिस को दे दिया, उसके तुरंत बाद वो बेहोश हो गये मेजर एलिस और कैप्टेन मार्टिन ने उन्हें दवाई दी और लौट गए. महारनी लक्ष्मी बाई नेपथ्य में अपने पति के पास आकर बैठ गई और दवाई के कारण राजा को नींद आ गयी और रात में 4 बजे राजा ने आँख खोली तब प्रजा अपने प्रिय राजा के स्वास्थ की मंगल कामना के लिए महल के सामने एकत्र हो रखी थी. लेकिन प्रजा की शुभकामना और मेजर एलिस की भाग-दौड़ और अंग्रेज डॉक्टर को बुलाना कहीं काम नहीं आया क्योंकि राजा ने अंग्रेजी उपचार लेने से मना कर दिया और 20 नवम्बर 1853 की मध्य रात्री को महाराजा ने देह त्याग दी।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)
रास बिहारी बोस को आखिर क्यों जाना पड़ा जापान #Rasbiharibose
रास बिहारी बोस भारत के प्रमुख क्रांतिकारी नेता थे. उनका ग़दर क्रांति और आजाद हिन्द फौज की स्थापना में भी योगदान था। रासबिहारी बोस का जन्म 2...
-
गंगाधर राव का जन्म 1814 मे हुआ था इनके पिता का नाम शिव राव भाऊ नेवालकर और माता का नाम पद्मा बाई था। गंगाधर राव नेवालकर उत्तर भारत में स्थित...
-
चित्तरंजन दास का जन्म 5 नवंबर 1870 को कोलकाता में हुआ। उनका परिवार मूलतः ढाका के बिक्रमपुर का प्रसिद्ध परिवार था। चितरंजन दास के पिता भुबनमो...
-
गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई, 1866 को रत्नागिरी जिले के तालुका गुहागर के कोथलुक नामक गाँव में हुआ था, जो कि वर्तमान में महाराष्ट्र मे ह...



