21 फ़रवरी 2023

चंद्रशेखर आजाद: महज 15 साल की उम्र में मिली कोड़ों की सजा

 

आजाद एक ऐसा  शब्द है जो महान स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद के साथ जुड़ा है। इन्होंने अपनी पूरी जिंदगी को आजाद रखने का चुनाव किया था और उसे आखिरी सांस तक निभाया भी।

चंद्रशेखर आजाद  का  जन्म 23 जुलाई  1906 को अलीराजपुर जिला के भाबरा गाँव   में हुआ था। इनके पिता का नाम पण्डित सीताराम तिवारी था

पंडित सीताराम तिवारी उस समय आए अकाल के कारण उत्तर प्रदेश के अपने पैतृक निवास बदरका को छोड़कर मध्य प्रदेश के अलीराजपुर रियासत में नौकरी करने लगे  और भाबरा गांव में बस गए । यहीं  चन्द्रशेखर का बचपन बीता। उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था। आजाद के एकमात्र भाई क़ा नाम सुखदेव था ।

 

 चंद्रशेखर  को उनके दोस्त पंडितजी, बलराज और क्विक सिल्वर जैसे कई उपनामों से बुलाते थे लेकिन आजाद उपनाम सबसे खास था और चंद्रशेखर को पसंद भी था।

उन्होंने अपने नाम के साथ तिवारी की जगह आजाद लिखना पसंद किया।

 

आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा गाँव में बीता।

 

बचपन में आजाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष-बाण चलाये। इस प्रकार उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीख ली थी।

 

चंद्रशेखर आजाद 14 वर्ष की आयु में बनारस गए और वहां एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की। वहां उन्होंने कानून भंग आंदोलन में योगदान दिया था। 1920-21 के वर्षों में वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े। वे गिरफ्तार हुए और जज के समक्ष प्रस्तुत किए गए।

 

उन्होंने जिला मजिस्ट्रेट न्यायाधीश रेवरेंड टॉमसन क्रेगटके सामने अपना नाम आजाद’, पिता का नाम 'स्वतंत्रता' और 'जेल' को उनका निवास बताया।

क्रोधित मजिस्ट्रेट ने चंद्रशेखर आजाद को 23 सप्ताह की जेल के साथ-साथ एक दिन में 15 कोड़े मारने की सजा देने का आदेश दिया

। हर कोड़े के वार के साथ उन्होंने, 'वन्दे मातरम्' और 'महात्मा गांधी की जय' का स्वर बुलंद किया। इसके बाद वे सार्वजनिक रूप से आजाद कहलाए।चंद्रशेखर आजाद का जन्मस्थान भाबरा अब 'आजादनगर' के रूप में जाना जाता है।

 

जब गांधीजी ने सन् 1920 में असहयोग आन्दोलन शुरू किया तों अन्य छात्रों की भाँति चन्द्रशेखर भी सडकों पर उतर आये।  इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे पहली बार गिरफ़्तार हुए और उन्हें 15 बेतों की सज़ा मिली। इस घटना का उल्लेख पं० जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक मेरी कहानी मे किया है.

 

 

चंद्र शेखर आजाद कुछ समय झाँसी से 15 किलो मीटर दूर ओरछा के जंगलों मे रहे जहा पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के उन्हें छ्द्म नाम दिया।

यही धिमारपुर गाँव में  इसी छद्म नाम से वह स्थानीय लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए । झांसी में रहते हुए चंद्रशेखर आजाद ने गाड़ी चलानी भी सीख ली थी

 

 

असहयोग आन्दोलन के दौरान फरवरी 1922 में चौरी चौरा की घटना के पश्चात् गाँधीजी ने आन्दोलन वापस लिया तो  आज़ाद का  कांग्रेस से मोह भंग हो गया

 

पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने 1924 में एक दल हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया। चन्द्रशेखर आज़ाद  इस दल में शामिल हो गये।

 

1जनवरी 1925 को दल ने पूरे हिन्दुस्तान में अपना बहुचर्चित पर्चा द रिवोल्यूशनरी  बाँटा जिसमें दल की नीतियों का खुलासा किया गया था। इस पर्चे में सशस्त्र क्रान्ति की चर्चा की गयी थी। लेखक के रूप में "विजयसिंह" का छद्म नाम दिया गया था

1928 में, चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह के साथ हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन संगठन को हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन में पुनर्गठित किया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने सेना-प्रमुख  का दायित्व सम्हाला। इस दल के गठन के पश्चात् एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया - "हमारी लड़ाई आखरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत।"

 

 स्वतन्त्रता के आन्दोलन को गति देने के लिये धन  की जरूरत थी इसके लिए शाहजहाँपुर में  बैठक के दौरान राम प्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनायी

इस योजना के अनुसार दल के ही एक प्रमुख सदस्य राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने 9 अगस्त 1925 को लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटी "आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन" को चेन खींच कर रोका और क्रान्तिकारी अशफाक उल्ला खाँ, चन्द्रशेखर आज़ाद व 6 अन्य सहयोगियों की सहायता से समूची ट्रेन पर धावा बोल दिया  और  सरकारी खजाना लूट लिया। बाद में अंग्रेजो ने उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के  40 क्रान्तिकारियों पर सरकार के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व यात्रियों की हत्या करने का प्रकरण चलाया जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह को फाँसी की सजा सुनायी गयी। हालांकि  अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को  पकड़ नहीं सके। इस प्रकरण में 16 अन्य क्रान्तिकारियों को कम से कम 4 वर्ष की सजा से लेकर अधिकतम आजीवन कारावास तक का दण्ड दिया गया।

दल के एक मात्र सदस्य अशफाक उल्ला खाँ ने इसका विरोध किया था। उनका तर्क था कि इससे प्रशासन उनके दल को जड़ से उखाड़ने पर तुल जायेगा और ऐसा ही हुआ भी

 

 

 

17 दिसम्बर, 1928 को चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और राजगुरु ने संध्या के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ़्तर को जा घेरा। ज्यों ही जे. पी. सांडर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकला, पहली गोली राजगुरु ने चलाई, जो साडंर्स के मस्तक पर लगी और वह मोटर साइकिल से नीचे गिर पड़ा। भगतसिंह ने आगे बढ़कर चारछह गोलियाँ और चलाई सांडर्स मौके पर ही मारा गया जब सांडर्स के अंगरक्षक ने पीछा किया तो चन्द्रशेखर आज़ाद ने अपनी गोली से उसे भी मार  दिया। लाहौर नगर में जगहजगह परचे चिपका दिए गए कि लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया। समस्त भारत में क्रान्तिकारियों के इस क़दम को सराहा गया।

 

आज़ाद के प्रशंसकों में पण्डित मोतीलाल नेहरू, पुरुषोत्तमदास टंडन का नाम शामिल  था। जवाहरलाल नेहरू से आज़ाद की भेंट आनन्द भवन में हुई थी उसका ज़िक्र नेहरू ने अपनी आत्मकथा में 'फासीवादी मनोवृत्ति' के रूप में किया है

 

आजाद ने 20 फरवरी को जवाहरलाल नेहरू से उनके निवास आनन्द भवन में भेंट की। आजाद ने पण्डित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु की फाँसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें।

 

 

आजाद के पूर्व सहयोगी वीरभद्र तिवारी और यशपाल ने पुलिस के लिए मुखबिरी की।

 

अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी CID  प्रमुख  JRH नॉट बोबर और  DSP ठाकुर विश्वेश्वर सिंह  जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आजाद ने तीन पुलिस कर्मियों को मौत के घाट उतार दिया और कई अंग्रेज़ सैनिक घायल हो गए। अंत में जब उनकी बंदूक में एक ही गोली बची तो वो गोली उन्होंने खुद को मार ली और वीरगति को प्राप्त हो गए। यह दुखद घटना 27 फ़रवरी 1931 के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी।पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था।

 

मनमथ नाथ, जिन्होंने आज़ाद को राम प्रसाद बिस्मिल से मिलवाया था जिन्होंने बाद में आज़ाद के विद्रोही कार्यों के बारे में अपनी जीवनी में चंद्रशेखर आज़ाद” – भारतीय क्रांतिकारी का इतिहास शीर्षक से एक पुस्तक लिखी।

 

 

 आजादी के बाद भारत सरकार द्वारा अल्फ्रेड पार्क का नाम बदलकर चंद्र शेखर आजाद पार्ककर दिया गया। आजाद ने जिस पेड़ के नीचे खुद को गोली मारी थी, उसे  भारतीय  स्मारक वृक्ष घोषित किया गया है।

 



चंद्रशेखर आजाद अपने साथ हमेशा एक माउज़र रखते थे। ये पिस्टल आज भी इलाहाबाद के म्यूजियम में रखी हुई है। आज़ाद हमेशा कहा करते थे दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं. आजाद ही रहेंगेभगतसिंह पर बनी कई फिल्मो में चंद्रशेखर आजाद के पात्र को बताया गया हैं।

 

 

अखिलेंद्र मिश्रा ने 2002 में फिल्म लीजेंड ऑफ भगत सिंह में आजाद की भूमिका निभाई। चंद्र शेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, बिस्मिल और अशफाक को फिल्म रंग दे बसंती में चित्रित किया गया था,  इस फिल्म का निर्माण और निर्देशन प्रसिद्ध भारतीय निर्देशक और निर्माता राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने किया था और आमिर खान ने इस फिल्म में चंद्रशेखर आजाद की भूमिका निभाई थी।

 

 में स्टार भारत पर प्रसारित हुई थी। आजाद के बचपन, किशोरावस्था और वयस्कता को इस सीरीज में  चित्रित किया है।

 

भारत सरकार ने 1988 में महान बलिदानी की स्मृति में डाक टिकट जारी किया |



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