20 मई 2023

मैं मर नहीं रहा हूँ, बल्कि स्वतन्त्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ.”



राजेंद्र लाहिड़ी का जन्म 23 जून, 1901 को बंगाल के पाबना ज़िले के मोहनपुर नामक गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम क्षिति मोहन शर्मा और माँ का नाम बसंत कुमारी था। इनके पिता बंगाल में चल रही अनुशीलन दल की गुप्त गतिविधियों में योगदान देने के आरोप में कारावास में कैद थे।


1909 में महज 9 साल की उम्र मे राजेंद्र लाहिड़ी को पढ़ाई के लिए वाराणसी भेजा गया, ताकि इनकी पढाई में कोई रूकावट न आये। ये पढाई में बेहद रूचि रखते थे। इन्होंने अपनी स्कूली पढाई वाराणसी से ही पूरी की तथा इतिहास विषय में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से ही उच्च शिक्षा प्रदान की। काकोरी काण्ड के दौरान लाहिड़ी ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय’ में इतिहास विषय में एम. ए. प्रथम वर्ष के छात्र थे।


जिस समय राजेन्द्र काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम. ए. कर रहे रहे थे तब उनकी मुलाकात बंगाल के क्रांतिकारी ‘युगांतर’ दल के नेता शचीन्द्रनाथ सान्याल से हुई।


राजेंद्र का देश-प्रेम देख शचीन्द्रनाथ सान्याल ने इन्हें अपने साथ शामिल कर लिया और बनारस से निकलने वाली पत्रिका बंग वाणी के सम्पादन कि जिम्मेदारी इनको दे दी।


 इसके साथ अनुशीलन समिति की वाराणसी शाखा के सशस्त्र विभाग का कार्य भी इनको दिया गया। इनकी कार्य कुशलता देख कर इन्हें हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन की गुप्त बैठकों में भी बुलाया जाने लगा।


आपको बता दें, काकोरी कांड की घटना 9 अगस्त 1925 को हुई थी। इस घटना मे रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह समेत अन्य दस क्रांतिकारी शामिल थे । 9 अगस्त, 1925 को काकोरी स्टेशन से एक ट्रैन चली ।


लखनऊ से 8 मील की दूरी पर चलती ट्रैन को 3 नौजवानों ने चैन खींच कर रोक दिया उनके ही साथियों ने गाडी में मौजूद सरकारी खजाना लूट लिया।उन जवानों ने बड़ी ही समझदारी से गाडी में बैठे यात्रियों को समझाया कि, उन्हें कुछ नहीं होगा सिर्फ शांती बनाये रखे।


इस बिच एक यात्री जबरदस्ती से ट्रैन से निचे उतर गया और गोली लगकर उसकी मौत हो गयी।

राजेंद्र लाहिड़ी 



इस घटना के बाद अंग्रेज़ो द्वारा की गयी जाँच में इन क्रांतिकारियो के शामिल होंने का राज खुल गया काकोरी कांड मे शामिल सभी क्रांतिकारियों को पुलिस ने पकड लिया । पकड़े गये सभी क्रांतिकारियो पर शासन के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने एवं खजाना लूटने का अभियोग चलाया गया।

इस कांड में लखनऊ की विशेष अदालत ने 6 अप्रैल 1927 को निर्णय सुनाया, जिसमे राजेन्द्र लाहिड़ी, रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह तथा अशफाक उल्लाह को फांसी की सजा हुई ।

काकोरी काण्ड के बाद बिस्मिल ने लाहिड़ी को बम बनाने का प्रशिक्षण लेने बंगाल भेज दिया। कलकत्ता में कुछ दूर स्थित दक्षिणेश्वर में इन्होंने बम बनाने का सामान इकट्ठा किया इस समय किसी साथी की असावधानी से एक बम फट गया और वह धमाका सुनकर पुलिस वहा आ गयी। और सबको गिरफ्तार कर लिया गया उन पर मुकदमा दायर किया और 10 वर्ष की सजा हुई जो अपील करने पर 5 वर्ष कर दी गयी।

तमाम अपीलों व दलीलों के बावजूद सरकार नहीं मानी और अंत मे पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल,अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह- एक साथ तीन व्यक्तियों को फाँसी दी गयी।

इनकी फांसी को लेकर जनता ने अंग्रेज़ो पर दबाव डालना शुरू किया।इस दबाव के कारण अंग्रेजी सरकार घबराने लगी थी इसलिए सरकार ने राजेन्द्रनाथ को समय से पहले ही, 17 दिसंबर 1927 को फांसी दे दी गयी थी इस तरह राजेंद्र जी ने ख़ुशी ख़ुशी फन्दा चूमने से पहले वंदे मातरम् की हुंकार भरते हुए कहा था – “मैं मर नहीं रहा हूँ, बल्कि स्वतन्त्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ.”

13 मई 2023

चित्तरंजन दास का जीवन परिचय एवं उनसे जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी।

चित्तरंजन दास का जन्म 5 नवंबर 1870 को कोलकाता में हुआ। उनका परिवार मूलतः ढाका के बिक्रमपुर का प्रसिद्ध परिवार था। चितरंजन दास के पिता भुबनमोहन दास कलकत्ता उच्च न्यायालय के जाने-माने वकीलों में से एक थे। वे बँगला में कविता भी करते थे। 

चित्तरंजन दास


सन्‌ 1890  में बी.ए. पास करने के बाद चितरंजन दास आइ.सी.एस्‌. बनने के लिए इंग्लैंड गए और सन्‌ 1892  में बैरिस्टर होकर स्वदेश लौटे। शुरू में तो वकालत ठीक नहीं चली। पर कुछ समय बाद खूब चमकी और इन्होंने अपना आर्थिक कर्ज भी चुका दिया।

लोगों को वकालत में इनकी कुशलता का परिचय  सर्वप्रथम 'वंदेमातरम्‌' के संपादक श्री अरविंद घोष पर चलाए गए राजद्रोह के मुकदमे में मिला और मानसिकतला बाग षड्यंत्र के मुकदमे ने तो कलकत्ता हाईकोर्ट में इनकी धाक अच्छी तरह जमा दी। इतना ही नहीं, इस मुकदमे में उन्होंने जो निस्स्वार्थ भाव से अथक परिश्रम किया और तेजस्वितापूर्ण वकालत का परिचय दिया उसके कारण समस्त भारतवर्ष में 'राष्ट्रीय वकील' नाम से इनकी ख्याति फैल गई। इस प्रकार के मुकदमों में ये फीस नहीं लेते थे।

1906 ई. में ये कांग्रेस में शामिल हुए। 1917  में ये बंगाल की प्रांतीय राजकीय परिषद् के अध्यक्ष हुए। इसी समय से वे राजनीति में भाग लेने लगे। सन्‌ 1917 ई. के कलकत्ता कांग्रेस के अध्यक्ष का पद श्रीमती एनी बेसंट को दिलाने में इनका प्रमुख योगदान था। इनकी उग्र नीति सहन न होने के कारण इसी साल श्री सुरेंद्रनाथ बनर्जी तथा उनके दल के अन्य लोग कांग्रेस छोड़कर चले गए और अलग से प्रागतिक परिषद् की स्थापना की। इन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह का समर्थन किया। लेकिन कलकत्ते में हुए कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में इन्होंने गान्धी असहयोग के प्रस्ताव का विरोध किया। नागपुर अधिवेशन में ये 250 प्रतिनिधियों का एक दल इस प्रस्ताव का विरोध करने के लिए ले गए थे, लेकिन अंत में इन्होंने स्वयं ही उक्त प्रस्ताव सभा के सम्मुख प्रस्तुत किया। कांग्रेस के निर्णय के अनुसार इन्होंने वकालत छोड़ दी और अपनी सारी सपत्ति मेडिकल कॉलेज तथा स्त्रियों के अस्पताल को दे डाली। इनके इस महान्‌ त्याग को देखकर जनता इन्हें 'देशबंधु' कहने लगी।

असहयोग आंदोलन में जिन विद्यार्थियों ने स्कूल कॉलेज छोड़ दिए थे उनके लिए इन्होंने ढाका में 'राष्ट्रीय विद्यालय' की स्थापना की। आसाम के चाय बागानों के मजदूरों की स्थिति ने भी कुछ समय तक इनका ध्यान आकर्षित किया था।

1921 में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन के लिए दस लाख स्वयंसेवक माँगे थे। उसकी पूर्ति के लिए इन्होंने प्रयत्न किया और खादी विक्रय आदि कांग्रेस के कार्यक्रमों में भाग लिया । 

1921 ई. में अहमदाबाद मे कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। लेकिन ये उस समय जेल में थे , इनके प्रतिनिधि के रूप में हकीम अजमल खाँ ने अध्यक्ष का कार्यभार सँभाला। इनका अध्यक्षीय भाषण श्रीमती सरोजिनी नायडू ने पढ़कर सुनाया।जिस समय जेल से छूटकर आए  तब तक आंदोलन लगभग समाप्त हो चुका था। बाहर से आंदोलन करने के बजाए इन्होंने कांउसिलों में घुसकर भीतर से अड़ंगा लगाने की नीति की घोषणा की। गया कांग्रेस में ये अध्यक्ष थे लेकिन इनका यह प्रस्ताव वहाँ स्वीकार न हो सका। अतएव इन्होंने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और स्वराज दल की स्थापना की। कांग्रेस को उनकी नीति माननी पड़ी और उनका कांउसिल प्रवेश का प्रस्ताव सितंबर, 1923 ई. में दिल्ली में हुए कांग्रेस के अतिरिक्त अधिवेशन में स्वीकार हो गया।

प्रस्ताव के अनुसार ये काउंसिल में शामिल हुए। इनका दल बंगाल काउंसिल में निर्विरोध चुना गया। इन्हांने मंत्रिमंडल बनाना अस्वीकार कर दिया और मंत्रियों के वेतनों को मान्यता देना नामंजूर कर मांटफोर्ड सुधारों की दुर्गति कर डाली। सन्‌ 1924-25 में इन्होंने कलकत्ता नगर महापालिका में अपने पक्ष के काफी लोग शामिल किये और स्वयं मेयर हुए।

इन दिनों कांग्रेस पर इनके स्वराज्य दल का पूरा कब्जा था और ये स्वयं उसके कर्ता-धर्ता थे। पटना के अधिवेशन में इन्होंने कांग्रेस की सदस्यता के लिए सूत कातने की अनिवार्य शर्त को ऐच्छिक कर दिया। लगभग इसी समय गोपीनाथ साहा नामक एक बंगाली व्यक्ति ने एक अंग्रेज की हत्या की और सरकार तथा इनके दल में झगड़ा शुरू हुआ। सरकार ने एक विज्ञप्ति प्रकाशित की और संदेह में 80 लोगों की पकड़ा। कलकत्ता कार्पोरेशन ने भी सरकार की इस नीति का विरोध किया।

चितरंजनदास के व्यत्तित्व के कई पहलू थे। वे उच्च कोटि के राजनीतिज्ञ तथा नेता तो थे ही, बँगला भाषा के अच्छे कवि तथा पत्रकार भी थे। बंगाल की जनता इनके कविरूप का बहुत आदर करती थी। बंग साहित्य के आंदोलनों में इनका प्रमुख हाथ रहा था। 'सागरसंगीत', 'अंतर्यामी', 'किशोर किशोरी' इनके काव्यग्रंथ हैं।

'सांगरसंगीत' का इन्होंने तथा श्री अरविंद घोष ने मिलकर अंग्रेजी में 'Songs of the sea' नाम से अनुवाद किया और उसे प्रकाशित किया। 'नारायण' नामक वैष्णव-साहित्य-प्रधान मासिक पत्रिका इन्होंने काफी समय तक चलाई। 1906 में प्रारम्भ हुए 'वंदे मातरम्‌' नामक अंग्रेजी पत्र के संस्थापक और संपादक मंडल दोनों के ये प्रमुख सदस्य थे और बंगाल स्वराज्य दल का मुखपत्र 'फार्वर्ड' तो इन्हीं की प्रेरणा और जिम्मेदारी पर निकला और चला। इन्होंने "इंडिया फार इन्डियन" नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना भी की थी।

बेलगाँव कांग्रेस में इन्होंने यह इच्छा व्यक्त की थी कि 148 नंबर, रूसा रोड, कलकत्ता वाले इनके मकान में स्त्रियों और बच्चों का अस्पताल बना दिया जाए । उनकी मृत्यु के बाद महात्मा गांधी ने C.R. दास स्मारक निधि के रूप में दस लाख रुपए इकट्ठे किए और भारत के इस महान्‌ सुपुत्र की यह अंतिम इच्छा पूर्ण की।

जिस वक्त देशबंधु चितरंजन दास का राजनैतिक जीवन चरम पर था, उसी वक्त काम के बोझ तले उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। मई 1925 में वो स्वास्थ्य लाभ लेने के लिए दार्जिलिंग चले गए, लेकिन उनका स्वास्थ्य बिगड़ता ही चला गया। इस बीच महात्मा गांधी भी खुद उनसे मिलने दार्जिलिंग आए थे। 16 जून 1925 को को तेज बुखार के कारण उनका निधन हो गया।

चितरंजन दास की अंतिम यात्रा कोलकाता में निकाली गई, जिसका नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया। गांधी जी ने कहा, ”देशबंधु एक महान आत्मा थे। उन्होंने एक ही सपना देखा था… आजाद भारत का सपना… उनके दिल में हिंदू और मुसलमानों के बीच कोई अंतर नहीं था।”

अपने निधन से कुछ समय पहले देशबन्धु ने अपना घर और सारी जमीन राष्ट्र के नाम कर दी। जिस घर में वे रहते थे, वहां अब चितरंजन दास राष्ट्रीय कैंसर संस्थान है। वहीं दार्जिलिंग वाला उनका निवास अब मातृ एवं शिशु संरक्षण केंद्र के रूप में राज्य सरकार द्वारा चलाया जा रहा है। दिल्ली का प्रसिद्ध आवासीय क्षेत्र 'सीआर पार्क' का नाम भी देशबंधु चितरंजन दास के नाम पर रखा गया है । देशभर में उनके नाम पर कई बड़े संस्थानों का नाम रखा गया है। देशबंधु कॉलेज हो या फिर चितरंजन अवेन्यू ऐसे कई संस्थान हैं, जिनकी देश को एक सूत्र में पिरोने वाले देशबंधु चितरंजन दास के नाम से पहचान है।

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