27 फ़रवरी 2023

गोपाल कृष्ण गोखले के बारे में पूरी जानकारी पढ़े

 गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई, 1866 को रत्नागिरी जिले के तालुका गुहागर के कोथलुक नामक गाँव में हुआ था, जो कि वर्तमान में महाराष्ट्र मे हैं।

गोपाल कृष्ण गोखले


इनके पिता का नाम कृष्णा राव गोखले और माता वालुबाई गोखले थी। 

इनके बड़े भाई का नाम गोविंद और छोटे bhai का नाम गोपाल था इनकी 4 बहने थी ।

गोखले की प्रारंभिक शिक्षा राजाराम हाईस्कूल से पूरी हुई इसके बाद वे मुंबई चले गए और साल 1884 में मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरी की ।

गोखले की दो शादियाँ हुई थीं। इनकी पहली शादी 1880 मे matrik की पढ़ाई के दौरान सावित्रीबाई से हो गयी थी ।

 इनकी पहली पत्नि सावित्रीबाई किसी असाध्य बीमारी से ग्रसित थी और जल्द ही उनका देहांत हो गया।

इसके बाद 1887 में इनका द्वितीय विवाह हुआ, उनकी दूसरी पत्नि ने 2 बेटियों को जन्म दिया और 1899 में उनकी दूसरी पत्नि की भी मृत्यु हो गयी।इसके बाद गोखले ने विवाह नहीं किया ।

इनके बच्चों का पालन – पोषण और देखभाल इनके रिश्तेदारों ने ही किया। इनकी एक बेटी का नाम काशी था,जबकि दूसरी बेटी का नाम गोदूबाई था।

इतिहास के ज्ञान और उसकी समझ ने उन्हें स्वतंत्रता, लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली को समझने और उसके महत्व को जानने में मदद की। एक शिक्षक के रुप में गोपाल कृष्ण गोखले की सफलता को देखकर बाल गंगाधर तिलक और प्रोफेसर गोपाल गणेश आगरकर का ध्यान इनकी तरफ गया और उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले को मुंबई स्थित डेक्कन ऐजुकेशन सोसाइटी में शामिल होने के लिए निमंत्रण दिया।

इसी दौरान गोखले श्री एम.जी. रानाडे के प्रभाव में आए। श्री एम.जी. रानाडे एक न्यायाधीश, विद्धान और समाज सुधारक थे, जिन्हें गोखले ने अपना गुरु बना लिया था। गोखले ने पूना सार्वजनिक सभा में रानाडे के साथ काम किया और उसके सचिव बन गए।

बाल गंगाधर तिलक तथा गोपाल गणेश आगरकर ने न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना की। यह स्कूल बाद में फर्ग्युसन काॅलेज में परिवर्तित हो गया। गोखले यहाँ पर इतिहास तथा अंग्रेजी के प्राध्यापक थे। यहाँ इन्होंने 20 वर्षों तक शिक्षण कार्य किया।

गोखले ने 1905 में सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी की स्थापना की ताकि नौजवानों को सार्वजनिक जीवन के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। उनका मानना था कि वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा भारत की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

गोपाल कृष्ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक जब कांग्रेस में साथ-साथ आए तो दोनों का ही मकसद भारत को आजादी दिलवाना था लेकिन समय के साथ साथ गोखले और तिलक की विचारधारा और सिद्धांतों में एक अपरिवर्तनीय दरार पैदा हो गई गोपाल कृष्ण गोखले को साल 1906 में राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया । इसके बाद दोनों की विचारधारा एकदम अलग हो गई और दोनों के बीच प्रतिद्धंद्धिता अपने चरम पर पहुंच गई थी।

राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी दो गुटों में बंट गई थी – जिसमें उदारवादी या नरम दल का नेतृत्व गोपाल कृष्ण गोखले ने किया जबकि बाल गंगाधर तिलक ने आक्रामक राष्ट्रवादी या गरम दल का नेतृत्व किया। 

महात्मा गाँधी गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।

गोखले के परामर्श से ही गांधीजी ने सक्रिय राजनीति में भाग लेने से पूर्व एक वर्ष तक देश में भ्रमण करके स्थिति का अध्ययन करने का निश्चय किया था। साबरमती आश्रम की स्थापना के लिए गोखले ने गांधीजी को आर्थिक सहायता दी थी। गांधीजी को अहिंसा के जरिए स्वतंत्रता संग्राम की लङाई की प्रेरणा गोखले से ही मिली थी। गोखले की प्रेरणा से ही गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ आन्दोलन चलाया था। 1912 में गांधीजी के आमंत्रण पर गोखले दक्षिण अफ्रीका गये और वहाँ रंगभेद की निन्दा की। गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में गोखले को अपना परामर्शदाता और मार्गदर्शक कहकर संबोधित किया है।

भारत का हीरा कहे जाने वाले गोपाल कृष्ण गोखले को जीवन के आखिरी दिनों में डाईबिटिज, कार्डिएक और अस्थमा जैसी बीमारियां हो गई थी। जिसके बाद 19 फरवरी 1915 को 49 वर्ष कि आयु मे उनकी मृत्यु हो गई और इस तरह भारत का बहादुर और पराक्रमी सपूत हमेशा के लिए सो गया।

25 फ़रवरी 2023

महात्मा गांधी जीवन परिचय! Mahatma Gandhi Biography in Hindi

हमारे इस स्वतन्त्रता संग्राम में देश के अनेक महापुरुषों ने अपना योगदान दिया है। भारत जैसे विविधता से भरे देश में पूरी जनता को अगर स्वतंत्रता संग्राम के लिए एकीकृत रूप से संगठित करने का श्रेय किसी महापुरुष को जाता है तो वह महात्मा गांधी है। 
महात्मा गांन्धी



 भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता महात्मा गांधी सत्य और अहिंसा की राह पर चलते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करते है।

 महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 ko गुजरात के पोरबंदर में हुआ था | इनके पिता का नाम करमचंद गांधी और माता का नाम पुतलीबाई था | महात्मा गांधी का असली नाम मोहनदास करमचंद गांधी था और यह अपने तीन भाइयों में सबसे छोटे थे। गांधी जी का सीधा-सरल जीवन इनकी मां से प्रेरित था। ब्रिटिश हुकूमत में इनके पिता पोरबंदर और राजकोट के दीवान थे।


सनातन धर्म के पंसारी जाति से संबंध रखते थे. इनके पिता कट्टर हिंदू एवं ब्रिटिश सरकार के अधीन गुजरात में काठियावाड़ की रियासत पोरबंदर के प्रधानमंत्री थे। गांधी जी की माता परनामी वैश्य समुदाय की थी। महात्मा गाँधी के अन्य नाम बापू, राष्ट्रपति, गांधी जी थे.गांधी जी का विवाह 1883 में 13 वर्ष की आयु में कस्तूरबा से हुआ था। गांधीजी” कस्तूरबा” को “बा” कह कर बुलाते थे। उनका यह बाल विवाह उनके माता -पिता के द्वारा तय किया गया था। महात्मागांधी के चार पुत्र थे जिनके नाम 
हरिलाल गांधी 
मणिलाल गांधी 
रामदास गांधी और
देवदास गांधी।      

गांधी जी की प्रारम्भिक शिक्षा पोरबंदर में हुई थी। पोरबंदर से उन्होंने मिडिल स्कूल तक की शिक्षा प्राप्त की, 
 पिता का राजकोट ट्रांसफर हो जाने की वजह से इन्होंने राजकोट से अपनी बची हुई शिक्षा पूरी की। साल 1887 में राजकोट हाई स्कूल से मैट्रिक पास की और आगे की पढ़ाई के लिये भावनगर के सामलदास कॉलेज में प्रवेश लिया,

  घर से दूर रहने के कारण वह अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाएं और अस्वस्थ होकर पोरबंदर वापस लौट गए। 4 सितम्बर 1888 को इंग्लैण्ड के लिये रवाना हुए। 

गांधीजी ने लंदन में लंदन वेजीटेरियन सोसायटी की सदस्यता ग्रहण की और इसके कार्यकारी सदस्य बन गये। गांधी जी लंदन वेजीटेरियन सोसाइटी के सम्मेलनों में भाग लेने लगे और पत्रिका में लेख लिखने लगे। यहां 3 सालों तक रहकर बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी की और लंदन में थियोसोफिकल नामक सोसाइटी के मुख्य सदस्यों से मिले। 

सोसायटी की स्थापना विश्व बंधुत्व के लिए 1875 में हुई थी और तो और इसमें बौद्ध और सनातन धर्म के ग्रंथों का संकलन भी था। इंग्लैंड से अपनी बैरिस्टर की पढाई पूरी करने के पश्चात 1914 में गांधी जी भारत लौट आए। देशवासियों ने उनका भव्य स्वागत किया ।

 गांधीजी भारत लौटे तो एक समारोह में उनका स्वागत मोहम्मद अली जिन्ना ने किया था भारत लौटने के बाद गांधीजी राजकोट में आकर वकालत करने लगे। इसी बीच दक्षिण अफ्रीका में भारतीय व्यापारी सेठ अब्दुल्ला के बुलावे पर वे उनका मुकदमा लड़ने के लिए दक्षिणअफ्रीका चले गए।
 वहां डरबन से ट्रैन के माध्यम से उन्हें प्रिटोरिया जाना था जिसके लिए उन्होंने रेल की फर्स्ट क्लास का टिकट लिया। उन दिनों अफ्रीका में अश्वेत और एशियन लोगो को फर्स्ट क्लास डिब्बे में बैठने की अनुमति नहीं थी इसलिए अंग्रेज टिकट चेकर ने गांधीजी को पीटरमारिट्जबर्ग स्टेशन पर धक्के मारकर बाहर निकाल दिया।

इस घटना ने गांधीजी को अंदर से झकझोर दिया और उन्होंने इस नस्लभेद के खिलाफ आवाज उठाने का बीड़ा उठा लिया। 

फरवरी 1919 में अंग्रेजों के बनाए रॉलेट एक्ट कानून पर, जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए जेल भेजने का प्रावधान था, उन्होंने अंग्रेजों का विरोध किया। फिर गांधी जी ने सत्याग्रह आंदोलन की घोषणा कर दी। इसके परिणामस्वरूप एक ऐसा राजनीतिक भूचाल आया, जिसने 1919 के बसंत में समूचे उपमहाद्वीप को झकझोर दिया।

इसके बाद उनके जीवन की असल यात्रा शुरू हुई जो अहिंसा आंदोलन से लेकर उनके राष्ट्रपिता बनने तक, और उनके जीवन पर्यंत चलती रही...।  
 

  उन्होंने अगले चार वर्ष भारतीय स्थिति का अध्ययन करने तथा उन लोगों को तैयार करने में बिताए जो सत्याग्रह के द्वारा भारत में प्रचलित सामाजिक व राजनीतिक बुराइयों को हटाने में उनका साथ दे सकें। 
 
 
इस सफलता से प्रेरणा लेकर महात्‍मा गांधी ने भारतीय स्‍वतंत्रता के लिए किए जाने वाले अन्‍य अभियानों में सत्‍याग्रह और अहिंसा के विरोध जारी रखे, जैसे कि 'असहयोग आंदोलन', 'नागरिक अवज्ञा आंदोलन', 'दांडी यात्रा' तथा 'भारत छोड़ो आंदोलन'। गांधी जी के इन सारे प्रयासों से भारत को 15 अगस्‍त 1947 को स्‍वतंत्रता मिली। 

30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधी के सीने पर तीन गोलियां दागकर उनकी हत्या की थी। 

 गांधी के सत्याग्रह आन्दोलन की वजह से जब गोडसे जेल गए तो वहीं से नाथूराम के मन में गांधी के लिए नफरत के भाव उभर आए।. कई ऐसे पल भी आए जब यह नफरत और बढ़ती गई । और फिर 1937 में वीर सावरकर को गोडसे ने अपना गुरु माना। देश के बंटवारे से गोडसे हिल चुका था। 
गोडसे मानता था कि भारत के बंटवारे और तब जो साम्प्रदायिक हिंसा हुई उसमें लाखों हिन्‍दुओं के मारे जाने के जिम्मेदार महात्मा गांधी हैं। ऐसे में उन लोगों ने गांधी की हत्या की पूरी प्लानिंग की और दिल्ली के बिड़ला भवन में जब प्रार्थना सभा खत्म हुई तो महात्मा गांधी बाहर निकलने लगे और इसी दौरान उनके पैर छूने का बहाना करते हुए गोडसे झुका और बैरेटा पिस्तौल से उनको तीन गोलियां दाग दीं। . 

गोडसे को हत्या का दोषि मानते हुए 15 नवंबर 1949 को अंबाला सेंट्रल जेल में फांसी दी गई थी। 

महात्मा गांधी का जन्मदिवस 'गांधी जयंती' के रूप में मनाया जाता है। चूंकि महात्मा गांधी जी द्वारा अहिंसा आंदोलन चलाया गया था, इसलिए विश्व स्तर पर उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए इस दिन को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

23 फ़रवरी 2023

उधम सिंह: 21 साल बाद लिया था जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला!

आज हम बात करेंगे उधम सिंह  की  जो भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के महान सेनानी एवं क्रान्तिकारी थे। उन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड के समय पंजाब के गर्वनर जनरल रहे माइकल ' डायर को लन्दन में जाकर गोली मारी थी।

उधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर 1899 को पंजाब प्रांत के संगरूर जिले के सुनाम गाँव के एक सिख परिवार में हुआ था।

 

उनके पिता सरदार तेहाल सिंह जम्मू के उपली गांव में रेलवे चौकीदार थे।उनकी माता नारायण कौर उर्फ नरेन कौर एक गृहणी थी। जो अपने दोनों बच्चे उधम सिंह और मुक्ता सिंह की देखभाल  करती थी।

 

 

1901 में उधमसिंह की माता और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के पुतलीगढ के सेंट्रल खालसा  अनाथालय  में शरण लेनी पड़ी। उधमसिंह के बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्तासिंह था, जिन्हें अनाथालय में क्रमश: उधमसिंह और साधुसिंह के नाम से लोग बुलाते थे

 

 इतिहासकार मालती मलिक के अनुसार उधमसिंह  सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे  इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर 'राम मोहम्मद सिंह आजाद' रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक है।

 

1917 में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया। 1918 में उधम ने मैट्रिक की परीक्षा पास की।

 

 साल 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया

1919 मे य़े ब्रिटिश आर्मी जॉइन करते हैं और 1st वर्ल्ड वार के दौरान इंग्लैंड मे नौकरी करते हैं

अंग्रेजो ने  वायदा किया था कि जो भी आर्मी जॉइन करेगा उन्हें जमीन और पेसा दिया जाएगा लेकिन दो साल आर्मी मे नौकरी  करने के बाद उनके पास सिर्फ 200 रुपये थे अंग्रेजो ने अपना वादा पूरा नहीं किया ऊधम सिंह कों लगता था कि उनके साथ धोखा हुआ है इसी दौरान वो   पंजाब         

की गदर पार्टी मे शामिल होते है

 

1919 में रॉलेट एक्ट के तहत कांग्रेस के सत्य पाल और सैफुद्दीन किचलू को अंग्रेज सरकार  ने अरेस्ट कर लिया जिसके बाद  पंजाब के अमृतसर में हजारों की तादाद में लोग एक पार्क में जमा हुए

इन लोगों का मकसद शांति से प्रोटेस्ट करना था।अंग्रेजों के जनरल रेजिनाल्ड डायर ने  फौज को  मासूम लोगों पर गोली चलाने का आदेश दिया  इस नरसंहार मे उसका साथ उस समय पंजाब के गवर्नर रहे माइकल -डायर ने दिया था. इस नरसंहार को जलियांवाला बाग हत्याकांड का नाम दिया गया. उधम सिंह 1919 में हुए जलियांवाला बाग नरसंहार के साक्षी थे. इस नरसंहार को देखने के बाद उधम सिंह ने रेजिनाल्ड डायर  और माइकल -डायर से बदला लेने की प्रतिज्ञा ली थी.

 

राजनीतिक कारणों से जलियाँवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं पाई। इस घटना से वीर उधमसिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल 'डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा  ली

 

इसी के दौरान ये अनेक राष्ट्रवादी जैसे सैफुद्दीन किचलु और मास्टर मोटा सिंह से मिलते हैं इसी बीच Udham सिंह युगांडा चले जाते हैं और वहां की रेलवे लाइन में काम करने लगते हैं

1922 में ये दोबारा भारत आते हैं और एक दुकान खोलते हैं जहां से ये क्रांतिकारी गतिविधियों  चलाते है।

इसके बाद ये दोबार U.S. चले जाते हैं जहा ये 3 साल तक रहते हैं और न्यू यॉर्क  और शिकागो मे काम करते हैं

 

आपको जानकर हैरानी होगी इस दौरान ऊधम  सिंह ने 2 हॉलीवुड मूवी elephant boy और the four feathers मे भी काम किया

बाद मे ये अपनी खुद की आजाद पार्टी का गठन करते हैं

 

जुलाई 1927 मे वापस भारत आते हैं साथ मे हथियार लाते हैं लेकिन 30 अगस्त  1927 को अमृतसर मे आर्म्स ऐक्ट  के तहत इनको गिरफ्तार कर लिया जाता है

 

इन्हें 5 साल की सजा होती है वहा भी ये अपने साथी कैदियों को राष्ट्रवादी  विचारों से प्रेरित करते है .इस वजह से अंग्रेज इनको अलग अलग जेलों मे रखते हैं

पंजाब जो आज वर्तमान मे पाकिस्तान मे है उसकी   मियाबाई  जैल  मे इनकी मुलाकात भगत सिंह से होती है

भगत सिंह यहा  साडर्स की हत्या और असेंबली मे बॉम्ब फेंकने के आरोप मे बंद होते हैं 

भगत सिंह द्वारा किए गए अपने देश के प्रति क्रांतिकारी कार्य और उनके समूहों से उधम सिंह बहुत ही प्रभावित हुए थे

 

और  भगत सिंह को अपना गुरु मानते थे.

1935 में जब उधम सिंह कश्मीर में थे तब उनको भगत सिंह के तस्वीर के साथ पकड़ा गया था. उस दौरान उधम सिंह  को  भगत सिंह  का सहयोगी मान लिया गया

ऊधम सिंह उस समय के महान क्रांतिकारी कवि राम प्रसाद बिस्मिल  के द्वारा लिखे गए गीतों को सुनने के,  बहुत शौकीन थे।

 

1932 मे जैल से रिहा होंने के 2 साल  बाद उधम सिंह इंग्लैंड चले जाते हैं जहा ये अपना नाम और वेश बदलकर रहते हैँ

 

 

अपने  ध्येय को अंजाम देने के लिए उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की। सन् 1934 में उधम सिंह लंदन पहुँचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपने ध्येय को पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। भारत के यह वीर क्रांतिकारी, माइकल 'डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगे।

 

उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल 'डायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुँच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके।

 

बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल 'डायर पर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल 'डायर को लगीं जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला। 4 जून 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई।

इस तरह उन्होंने अपने देश के लिए मात्र 40 वर्ष की आयु में अपने आप को समर्पण कर दिया।

 उत्तर भारतीय राज्य उत्तराखण्ड के एक जनपद का नाम भी इनके नाम पर उधम सिंह नगर रखा गया है।

 ऊधम सिहं  के हथियार जैसे :- चाकू, डायरी और शूटिंग के दौरान उपयोग की गई गोलियों को स्कॉटलैंड यार्ड में ब्लैक म्यूजियम  में रखा गया है.

 

राजस्थान के अनूपगढ़ में शहीद उधम सिंह के नाम पर चौकी भी मौजूद है.

अमृतसर के जलियावाला बाग के नजदीक ऊधम सिंह  समर्पित एक म्यूजियम भी बनाया गया है.

 

उनकी पुण्यतिथि के दिन पंजाब और हरियाणा में सार्वजनिक अवकाश रहता है.

उधम सिंह जी के द्वारा दिए गए बलिदान को कई भारतीय फिल्मों में फिल्माया गया है

जैसे

जलियांवाला बाग़

शहीद उधम सिंह

सरदार  ऊधम सिंह

सरदार उधम सिंह फिल्म में उधम सिंह के लंदन जाकर जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लेने की कहानी को दिखाया गया है|

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