गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई, 1866 को रत्नागिरी जिले के तालुका गुहागर के कोथलुक नामक गाँव में हुआ था, जो कि वर्तमान में महाराष्ट्र मे हैं।
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| गोपाल कृष्ण गोखले |
इनके पिता का नाम कृष्णा राव गोखले और माता वालुबाई गोखले थी।
इनके बड़े भाई का नाम गोविंद और छोटे bhai का नाम गोपाल था इनकी 4 बहने थी ।
गोखले की प्रारंभिक शिक्षा राजाराम हाईस्कूल से पूरी हुई इसके बाद वे मुंबई चले गए और साल 1884 में मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरी की ।
गोखले की दो शादियाँ हुई थीं। इनकी पहली शादी 1880 मे matrik की पढ़ाई के दौरान सावित्रीबाई से हो गयी थी ।
इनकी पहली पत्नि सावित्रीबाई किसी असाध्य बीमारी से ग्रसित थी और जल्द ही उनका देहांत हो गया।
इसके बाद 1887 में इनका द्वितीय विवाह हुआ, उनकी दूसरी पत्नि ने 2 बेटियों को जन्म दिया और 1899 में उनकी दूसरी पत्नि की भी मृत्यु हो गयी।इसके बाद गोखले ने विवाह नहीं किया ।
इनके बच्चों का पालन – पोषण और देखभाल इनके रिश्तेदारों ने ही किया। इनकी एक बेटी का नाम काशी था,जबकि दूसरी बेटी का नाम गोदूबाई था।
इतिहास के ज्ञान और उसकी समझ ने उन्हें स्वतंत्रता, लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली को समझने और उसके महत्व को जानने में मदद की। एक शिक्षक के रुप में गोपाल कृष्ण गोखले की सफलता को देखकर बाल गंगाधर तिलक और प्रोफेसर गोपाल गणेश आगरकर का ध्यान इनकी तरफ गया और उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले को मुंबई स्थित डेक्कन ऐजुकेशन सोसाइटी में शामिल होने के लिए निमंत्रण दिया।
इसी दौरान गोखले श्री एम.जी. रानाडे के प्रभाव में आए। श्री एम.जी. रानाडे एक न्यायाधीश, विद्धान और समाज सुधारक थे, जिन्हें गोखले ने अपना गुरु बना लिया था। गोखले ने पूना सार्वजनिक सभा में रानाडे के साथ काम किया और उसके सचिव बन गए।
बाल गंगाधर तिलक तथा गोपाल गणेश आगरकर ने न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना की। यह स्कूल बाद में फर्ग्युसन काॅलेज में परिवर्तित हो गया। गोखले यहाँ पर इतिहास तथा अंग्रेजी के प्राध्यापक थे। यहाँ इन्होंने 20 वर्षों तक शिक्षण कार्य किया।
गोखले ने 1905 में सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी की स्थापना की ताकि नौजवानों को सार्वजनिक जीवन के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। उनका मानना था कि वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा भारत की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
गोपाल कृष्ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक जब कांग्रेस में साथ-साथ आए तो दोनों का ही मकसद भारत को आजादी दिलवाना था लेकिन समय के साथ साथ गोखले और तिलक की विचारधारा और सिद्धांतों में एक अपरिवर्तनीय दरार पैदा हो गई गोपाल कृष्ण गोखले को साल 1906 में राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया । इसके बाद दोनों की विचारधारा एकदम अलग हो गई और दोनों के बीच प्रतिद्धंद्धिता अपने चरम पर पहुंच गई थी।
राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी दो गुटों में बंट गई थी – जिसमें उदारवादी या नरम दल का नेतृत्व गोपाल कृष्ण गोखले ने किया जबकि बाल गंगाधर तिलक ने आक्रामक राष्ट्रवादी या गरम दल का नेतृत्व किया।
महात्मा गाँधी गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।
गोखले के परामर्श से ही गांधीजी ने सक्रिय राजनीति में भाग लेने से पूर्व एक वर्ष तक देश में भ्रमण करके स्थिति का अध्ययन करने का निश्चय किया था। साबरमती आश्रम की स्थापना के लिए गोखले ने गांधीजी को आर्थिक सहायता दी थी। गांधीजी को अहिंसा के जरिए स्वतंत्रता संग्राम की लङाई की प्रेरणा गोखले से ही मिली थी। गोखले की प्रेरणा से ही गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ आन्दोलन चलाया था। 1912 में गांधीजी के आमंत्रण पर गोखले दक्षिण अफ्रीका गये और वहाँ रंगभेद की निन्दा की। गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में गोखले को अपना परामर्शदाता और मार्गदर्शक कहकर संबोधित किया है।
भारत का हीरा कहे जाने वाले गोपाल कृष्ण गोखले को जीवन के आखिरी दिनों में डाईबिटिज, कार्डिएक और अस्थमा जैसी बीमारियां हो गई थी। जिसके बाद 19 फरवरी 1915 को 49 वर्ष कि आयु मे उनकी मृत्यु हो गई और इस तरह भारत का बहादुर और पराक्रमी सपूत हमेशा के लिए सो गया।
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