23 सितंबर 2023

Kamladevi Chattopadhyay Biography Hindi कमलादेवी चट्टोपाध्याय की जीवनी

स्वतंत्रता संघर्ष के ऐतिहासिक युग की जब भी बात होती है तो कुछ गिने-चुने ही क्रांतिकारी और समाज सुधारकों की चर्चा होती है ऐसा ही एक नाम है समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी, और भारतीय हस्तकला के क्षेत्र में नई रोशनी की किरण लाने वाली ‘कमलादेवी चट्टोपाध्याय’ का। इन्होंने हस्तकला को पुनर्जीवित किया, आज़ादी की मांग की, नमक आंदोलन और असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। इतना ही नहीं इन्होंने राजनीति में आने और चुनाव लड़ने तक का साहस जुटाया। कमलादेवी चट्टोपाध्याय का जन्म 3 अप्रैल 1903 को कर्नाटक के मैंगलोर शहर में हुआ था। इनके पिता का नाम अनंत धारेश्वर था जो उस समय मैंगलोर के जिला कलेक्टर थे और मा का नाम गिरिजा देवी था अपने तीनभाई बहनो मे ये सबसे छोटी थी। कर्नाटक से ही इन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा पूरी की थी। जिसके बाद इन्होंने चेन्नई के क्यून मैरी कॉलेज में admission ले लिया था और यहां से अपनी आगे की शिक्षा जारी रखी। इनकी शादी महज़ 14 साल की उम्र में कृष्णा राव से हुई थी शादी के दो साल बाद ही इनके पति का निधन हो गया। कमलादेवी जब 20 साल की थी तब इनका दूसरा विवाह सरोजनी नायडू के भाई हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय के साथ हुआ जो एक कवि होने के साथ-साथ नाटककार भी थे इनके बेटे का नाम रामकृष्ण चट्टोपाध्याय था। शादी के कुछ साल बाद ही कमलादेवी अपने पति के साथ लंदन चली गई लंदन में रहते हुए इन्होंने जिमलोम बेडफ़ोर्ड कॉलेज से समाजशास्त्र से डिप्लोमा किया। कमलादेवी की ये शादी महज 32 साल तक ही चल सकी और इन्होंने अपने पति से अलग होने का फैसला किया। वर्ष 1920 के दशक में खुले राजनीतिक चुनाव में खड़े होने का साहस जुटाया था, वह भी ऐसे समय में जब बहुसंख्यक भारतीय महिलाओं को आजादी शब्द का अर्थ भी नहीं मालूम था। भारत आने के बाद इन्होंने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया आंदोलन में भाग लेने के साथ-साथ, सेवा दल नामक एक संगठन में भी हिस्सा लिया था. ये संगठन सामाजिक उन्नति के लिए कार्य करता था। साल 1926 तक कमलादेवी ने देश में हो रहे कई आंदोलनों में भाग लिया था और इसी दौरान इनको मद्रास प्रांतीय विधान सभा का कार्य संभालने का मौका मिला था, जिसके साथ ही ये हमारे देश की पहली ऐसी महिला बन गई थी, जिन्होंने विधान सभा का कार्यालय चलाया था। गाँधी जी के ‘नमक आंदोलन’ और ‘असहयोग आंदोलन’ में हिस्सा लेने वाली महिलाओं में से एक थीं। नमक कानून तोड़ने के मामले में बांबे प्रेसीडेंसी में गिरफ्तार होने वाली ये पहली महिला थीं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ये चार बार जेल गईं और पांच साल तक सलाखों के पीछे रहीं। महिलाओं का स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश का श्रेय कमलादेवी को ही जाता है।इन्होने ‘ऑल इंडिया वीमेन्स कांफ्रेंस’ की स्थापना की। भारत में आज अनेक प्रमुख सांस्कृतिक संस्थान इनकी दूरदृष्टि और पक्के इरादे के परिणाम हैं. जिनमें प्रमुख हैं- नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, संगीत नाटक अकेडमी, सेन्ट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज एम्पोरियम और क्राफ्ट कौंसिल ऑफ इंडिया। इन्होंने हस्तशिल्प और को-ओपरेटिव आंदोलनों को बढ़ावा देकर भारतीय जनता को सामाजिक और आर्थिक रूप से विकसित करने में अपना योगदान दिया। हालांकि इन कार्यों को करते समय इन्हें आजादी से पहले और बाद में सरकार से भी संघर्ष करना पड़ा। भारत की आजादी के लिए कमलादेवी ने एक बार विश्व दौरा भी किया था और अपने इस दौरे के दौरान इन्होंने भारत के हालातों को दुनिया के देशो के सामने रखा था ताकि देश की आजादी के लिए अंग्रेजो पर दवाब बनाया जा सके। जब भारत को आजादी मिली , तो उस वक्त पाकिस्तान से बहुत सारे लोग भारत आए थे। इन लोगों के पास ना तो घर था, ना खाने के लिए खाना. ऐसी स्थिति में इन लोगों की मदद कमलादेवी जी ने की थी और इन्होंने उस समय इन लोगों के रहने के लिए फरीदाबाद शहर बसाया था। इस शहर में करीब 50 हजार से अधिक शरणार्थियों का पुनर्वास किया गया था। कमला देवी ने अपनी अंतिम सांस महाराष्ट्र के मुंबई में 29 अक्टूबर 1988 ली थी जिस वक्त इनकी मृत्यु हुई थी उस वक्त इनकी आयु 85 वर्ष थी। कमला चट्टोपाध्याय पहली भारतीय महिला थीं, जिन्होंने हथकरघा और हस्तशिल्प को न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। आजादी के बाद इन्हें वर्ष 1952 में ‘आल इंडिया हेंडीक्राफ्ट’ का प्रमुख नियुक्त किया गया। कमलादेवी चट्टोपाध्याय को लिखने का भी शोंक था और उन्होंने कई पुस्तकें लिखी जो लोगो में काफी चर्चित हुयीं। जैसे द अवेकिंग ऑफ इंडियन वोमेन जापान इट्स विकनेस एंड स्ट्रेन्थ अंकल सैम एम्पायर ‘इन वार-टॉर्न चाइना टुवर्ड्स ए नेशनल थिएटर’ इतना ही नहीं कमलादेवी ने एक अभिनेत्री के रूप में भी काम किया। इनकी दो मूक फिल्में भी की । साल 1931 में ‘मृच्छाकटिका’और साल 1943 में तानसेन फिल्म ‘शंकर पार्वती’ और ‘ धन्ना भगतट में भी इन्होंने महत्वपूर्ण किरदार निभाया था। समाज सेवा के लिए भारत सरकार ने इन्हें 1955 में नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया। सामुदायिक नेतृत्व के लिए वर्ष 1966 में इन्हें ‘रेमन मैग्सेसे’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इन्हें संगीत नाटक अकादमी द्वारा ‘फेलोशिप और रत्न सदस्य’ से सम्मानित किया गया। संगीत नाटक अकादमी के द्वारा ही वर्ष 1974 में इन्हें ‘लाइफटाइम अचिवेमेंट’ पुरस्कार भी प्रदान किया गया था। यूनेस्को ने इन्हें वर्ष 1977 में हेंडीक्राफ्ट को बढ़ावा देने के लिए सम्मानित किया था। शान्ति निकेतन ने अपने सर्वोच्च सम्मान ‘देसिकोट्टम’ से सम्मानित किया। 1987 में भारत सरकार ने दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से इन्हें सम्मानित किया। मार्च 2017 में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला बुनकरों एवं शिल्पियों के लिए ‘कमलादेवी चट्टोपाध्याय राष्ट्रीय पुरस्कार’ शुरू करने की घोषणा की गयी। इनके 115 जन्म दिवस के दिन यानी 3 अप्रैल को इन्हें याद करते हुए गूगल ने अपने होमपेज को इनके नाम किया और डूडल में इनकी तस्वीर के साथ संगीत और हस्तकला को दिखाया . इस तस्वीर के जरिए डूडल ने कमलादेवी के उन योगदानो की झलक दिखाने की कोशिश की जो इन्होंने हमारे देश को दिए हैं।

रास बिहारी बोस को आखिर क्यों जाना पड़ा जापान #Rasbiharibose

रास बिहारी बोस भारत के प्रमुख क्रांतिकारी नेता थे. उनका ग़दर क्रांति और आजाद हिन्द फौज की स्थापना में भी योगदान था। रासबिहारी बोस का जन्म 2...